पान सिंह तोमर को डकैत नहीं जांबाज एथलीट कहो जनाब

चम्बल के लाल ने सात बार जीता राष्ट्रीय बाधा दौड़ का खिताब

सेना में शामिल होकर दुश्मनों के होश उड़ाए, मजबूरी में उतरे बीहड़

खेलपथ संवाद

मुरैना। पान सिंह को डकैत कहना गलत होगा। स्टिपलचेज के सात बार राष्ट्रीय चैम्पियन रहे जांबाज योद्धा पान सिंह तोमर को बीहड़ का रास्ता मजबूरी वश चुनना पड़ा था। देखा जाए तो एक खिलाड़ी के लिए कल भी दिक्कतें थीं और आज भी हैं। मुरैना का ही एक और जांबाज अंतरराष्ट्रीय एथलीट ओमप्रकाश सिंह तोमर भी तो जिले में स्पोर्ट्स सिस्टम में सुधार को लेकर अपनी पीड़ा शासन-प्रशासन तक जता और बता रहा है।

इंसान जन्म से डाकू या बागी नहीं होता। उसे मजबूर किया जाता है, गलत रास्ता चुनने के लिए। हमारा समाज ही उसे हथियार उठाने को उकसाता है। वर्षों देश की सेवा करने के बाद पान सिंह तोमर ने जंगलों की दुनिया को क्यों चुना। पान सिंह तोमर ने समाज के गलत फैसलों के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू की थी, क्या यह गुनाह था। शायद उस समय बीहड़ ही बागियों के लिए सबसे सुरक्षित जगह होती थी।

एक जनवरी, 1932 को पान सिंह तोमर का जन्म मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के भिदौसा गांव में हुआ। पान सिंह तोमर बचपन से दौड़ने में काफी तेज थे। गांव के लोग उनकी दौड़ को देखकर हैरान रह जाते थे। साल 1949 में पान सिंह तोमर ने इंडियन आर्मी ज्वाइन की। देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा उस दौर में हर बच्चे के अंदर होता था। पान सिंह को उनकी दौड़ ने आसानी से आर्मी में प्रवेश दिला दिया। फिर शुरू हुई उनकी देशसेवा।

आर्मी में रहते हुए ही पान सिंह तोमर ने दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और इसी दौरान सात बार राष्ट्रीय बाधा दौड़ के चैम्पियन बने। देशवासियों का सिर उन्होंने गर्व से ऊंचा कर दिया था। खुद मिल्खा सिंह ने भी उनकी तारीफ की थी। अपनी दौड़ की बदौलत पान सिंह तोमर काफी नाम कमा चुके थे। 1952 के एशियाई खेलों में पान सिंह तोमर ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि वो यहां पर कोई पदक नहीं जीत पाए, वजह थी जूते पहनकर दौड़ना। पान सिंह तोमर ने हमेशा नंगे पैर ही रेस जीती थी, लेकिन यहां उन्हें नियम के मुताबिक जूते पहनकर दौड़ना पड़ा।

गांव में दबंगों ने उनकी जमीन पर कर लिया था कब्जा

एक तरफ जांबाज पान सिंह देश के लिए मेडल जीत रहे थे तो दूसरी तरफ उनके गांव में उनके परिवार को परेशान किया जा रहा था। गांव के दबंगों ने पान सिंह तोमर और उनके चाचा की जमीन पर कब्जा कर लिया था। फौज में रहते हुए पान सिंह अपने परिवार के लिए कुछ नहीं कर पा रहे थे। परिवार की खातिर पान सिंह ने टाइम से पहले ही रिटायरमेंट लेने का मन बना लिया। वो फौज की नौकरी छोड़कर अपने गांव आ गए, बावजूद इसके गांव के दबंगों ने उनकी जमीन पर कब्जा नहीं छोड़ा। पान सिंह तोमर ने पुलिस की मदद लेनी चाही, लेकिन पुलिस वालों ने भी दबंगों का साथ दिया। बड़े-बड़े ऑफिसर्स से उन्होंने मुलाकात की, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।

गांव के दबंगों ने मां को पीट-पीटकर दी थी मौत

गांव के दबंगों ने पान सिंह तोमर के परिवार को परेशान करना शुरू कर दिया था। इन लोगों ने पान सिंह तोमर की पिटाई भी की। ये सिलसिला चलता रहा। हद तो तब हो गई जब एक दिन पान सिंह तोमर की बूढ़ी मां को घर में अकेला देखकर इन दबंगों ने उन्हें भी अधमरा कर दिया। ये एक बेटे की सबसे बड़ी हार थी। बूढ़ी मां घर पर अधमरी हालत में पड़ी हुई थी। फौज के सूबेदार रह चुके पान सिंह तोमर खुद को बेहद कमजोर महसूस कर रहे थे। मां ने अपने बेटे से वचन लिया कि वो इन दबंगों से बदला लेगा और फिर उनकी मां की मौत हो गई।

अब पान सिंह तोमर का एकमात्र लक्ष्य था ऐसे लोगों को मौत देना। जो बंदूक कभी देशसेवा के लिए उठाई थी अब वही बंदूक पान सिंह तोमर ने इन लोगों को मारने के लिए उठाई। इन दबंगों के साथ-साथ गांव के थाने के दरोगा को भी पान सिंह ने मौत दी। एक ही दिन में चार हत्या कर चुके पान सिंह तोमर के पीछे अब पुलिस पड़ चुकी थी। बस इसके बाद उन्होंने अपने परिवार के साथ बीहड़ का रुख किया। पुलिस से बचने के लिए जंगलों में शरण ली।

जंगल में पान सिंह तोमर ने बनाया अपना एक गैंग

जंगल में पान सिंह ने अपना एक गैंग बनाया। इस गैंग में पान सिंह के परिवार के अलावा वो लोग भी शामिल थे जो उन्होंने फौज के समय से अपना आदर्श मानते थे। पान सिंह ने सबको हथियार चलाना सिखाया। सभी को आर्मी ट्रेनिंग दी। करीब 30 लोगों का गैंग तैयार हो चुका था और ये लोग अब गांव-गांव में लूटपाट मचाने लगे थे। हत्या, अपहरण, मारपीट पान सिंह तोमर पर अब सब तरह के आरोप लगने शुरू हो चुके थे।

कभी देश की इज्जत बढ़ाने वाले पान सिंह तोमर अब डकैत बन चुके थे। कई सालों तक ये सिलसिला जारी रहा। साल 1981 में पान सिंह तोमर ने मुखबिरी करने के आरोप में एक मुखिया और उसके परिवार के छह लोगों को एक साथ मौत की नींद सुला दिया। इस घटना के बाद मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने पान सिंह तोमर को जल्द से जल्द जिंदा या मुर्दा पकड़ने के आदेश दिए थे।

साल 1981 में पुलिस एनकाउंटर में हुई पान सिंह की मौत

इसी साल पान सिंह तोमर अपने गैंग के 18 लोगों के साथ एक गांव में गया था, कि कुछ लोगों ने पुलिस को इस बात की जानकारी दे दी। बस पुलिस ने पान सिंह को चारों तरफ से घेर लिया। इसी पुलिस एनकाउंटर में पान सिंह तोमर की मौत हुई। पान सिंह तोमर ने बेशक आर्मी से रिटायर होने के बाद बीहड़ को चुन लिया हो, लेकिन उनके बेटे फौज में शामिल हुए। पान सिंह तोमर के एक बेटे ने सूबेदार पद से रिटायरमेंट ली और आज भी उनका परिवार झांसी में रहता है। पान सिंह तोमर पर एक फिल्म भी बनी है जिसमें पान सिंह तोमर की भूमिका इरफान खान ने निभाई थी।

पाठकों को हम बता दें रमेश सिकरवार चम्बल के उन आख़िरी डाकुओं में से हैं, जिन्होंने 1980 के दशक में आत्मसमर्पण कर दिया था। उन्होंने मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कहने पर 27 अक्टूबर, 1984 को हथियार डाल दिए थे। उनके अलावा उनकी गैंग के 32 अन्य सदस्यों ने भी आत्मसमर्पण कर दिया था। फिर 10 साल की सज़ा काटने के बाद उन्होंने अपनी नई ज़िन्दगी शुरू की। मध्य प्रदेश का चम्बल सम्भाग दशकों तक डकैतों के आतंक का गढ़ रहा। फिर विनोबा भावे, जय प्रकाश नारायण और गांधीवादी सुब्बा राव के प्रयासों की वजह से 654 से भी ज़्यादा डकैतों ने आत्मसमर्पण किया।

डकैतों के आत्मसमर्पण का सिलसिला 1960, 1970 और 1980 के दशकों तक चलता रहा। इस दौरान लगभग एक हज़ार डकैतों ने आत्म समर्पण किया। इससे चम्बल डकैतों के आतंक से मुक्त हो पाया। बहुत सारे डकैत सज़ा काटकर आम ज़िम्दगी में लौटे। कइयों ने अपनी क़िस्मत राजनीति में भी आज़माई। कुछ चुनाव भी लड़े। लेकिन ये मध्य प्रदेश की राजनीति में उतने सफल नहीं हो पाए, जबकि समाज के एक बड़े तबक़े पर इनका प्रभाव आज भी मौजूद है।

मध्य प्रदेश के अपराध अनुसंधान विभाग यानी सीआईडी के आंकड़ों के मुताबिक 1960 से लेकर 1976 तक 654 डकैतों ने अलग-अलग स्थानों पर आत्मसमर्पण किया था। इनमें बटेश्वर और राजस्थान के धौलपुर के अलावा जहां सबसे बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण हुआ था, वो था मुरैना जिले का जौरा गांव, जहां सुब्बा राव का गांधी सेवाश्रम स्थित है। आत्मसमर्पण करने वाले डकैतों ने जेल की सजा पूरी होने के बाद गांधी सेवाश्रम में रहकर लोगों की सेवा का भी काम शुरू किया।

 

 

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