राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक में महिलाओं की भागीदारी पर जोर

राष्ट्रीय खेल बोर्ड, राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण और चुनाव पैनल का होगा गठन
खेलपथ संवाद
नई दिल्ली। बुधवार को लोकसभा में मोदी सरकार ने खेलों में पारदर्शिता लाने, विवादों को कम करने सहित कई मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक पेश किया। इस बिल को युवा और खेल मंत्री मनसुख मंडाविया ने पेश किया। बिल पास हो जाने के बाद देश की सभी खेल इकाइयां इस विधेयक के दायरे में आएंगी। मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड जैसी स्वायत संस्था भी अब नए राष्ट्रीय खेल शासन विधेयक में आएगी।
बिल के प्रावधानों के मुताबिक सभी राष्ट्रीय महासंघों को इस विधेयक के अधिनियम बन जाने के बाद देश के कानून का पालन करना अनिवार्य होगा। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड खेल मंत्रालय से वित्तीय मदद नहीं लेता फिर भी संसद का अधिनियम उस पर लागू होगा। इस विधेयक में खेल निकायों में अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष के पद के लिए लगातार तीन कार्यकाल तय किए गए हैं। बात करें आयु सीमा की तो ये 70 साल रखी गई है हालांकि, खेल के अंतरराष्ट्रीय नियमों से अनुमति मिलने पर नामांकन के समय इसे 75 साल तक बढ़ाया जा सकता है।
किसी भी खेल संस्था की कार्यकारी समिति में 15 सदस्य हो सकते हैं। इसके पीछे मकसद है कि महासंघ पर आर्थिक बोझ ज़्यादा न पड़े। इसके साथ ही कार्यकारी समिति में कम से कम दो उत्कृष्ट खिलाड़ी और चार महिला खिलाड़ियों के होने की अनिवार्यता भी है।
राष्ट्रीय खेल बोर्ड:
विधेयक की सबसे खास बात है राष्ट्रीय खेल बोर्ड (एनएसबी), जिसके पास सभी राष्ट्रीय खेल महासंघों को मान्यता देने या निलम्बित करने की ताकत होगी। एनएसबी में एक अध्यक्ष होगा। केंद्र सरकार इसके सदस्यों की नियुक्ति करेगी। इसके लिए एक कमेटी होगी, जिसके अध्यक्ष कैबिनेट सचिव या खेल सचिव होंगे। इस पैनल के अन्य सदस्यों में भारतीय खेल प्राधिकरण के डीजी और दो खेल प्रशासक होंगे। ये वो व्यक्ति होंगे जो किसी राष्ट्रीय खेल निकाय के अध्यक्ष, महासचिव या कोषाध्यक्ष रह चुके होंगे। इसके साथ ही द्रोणाचार्य, खेल रत्न या अर्जुन पुरस्कार विजेता एक खिलाड़ी भी होगा।
राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण:
खेल मंत्रालय के अनुसार, चयन से लेकर चुनाव तक देश की विभिन्न अदालतों में 350 से ज़्यादा मामले लम्बित हैं, जो एथलीटों और राष्ट्रीय खेल महासंघों के विकास में बाधा हैं। राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण की स्थापना से यह समस्या खत्म हो जाएगी। इसकी वजह ये है कि इसके पास दीवानी न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी। इसमें एक अध्यक्ष और दो सदस्य होंगे। ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान या रिटायर्ड जज या किसी हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश होगा। इसकी नियुक्तियां केंद्र सरकार के हाथ में होंगी। सरकार एक कमेटी की सिफारिशों पर नियुक्ति करेगी।
राष्ट्रीय खेल चुनाव पैनल:
चुनाव पैनल की नियुक्ति भी केंद्र सरकार करेगी। इसके लिए वो राष्ट्रीय खेल बोर्ड की सिफारिश पर काम करेगी। पैनल में देश के चुनाव आयोग या राज्य निर्वाचन आयोग के रिटायर्ड सदस्य या राज्यों के रिटायर्ड मुख्य निर्वाचन अधिकारी या उप-चुनाव आयुक्त शामिल होंगे। इस विधेयक की एक और खास बात है आरटीआई।
सरकार के पास कितनी पॉवर?
‘भारत’ ‘भारतीय’ ‘राष्ट्रीय’ शब्द या राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करने के लिए हर खेल संगठन को केंद्र सरकार से एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) लेनी होगी। कुछ परिस्थितियों में सरकार इसमें रियायत भी दे सकती है। इसके अलावा सरकार विधेयक के प्रावधानों के ‘कुशल प्रशासन’ के लिए राष्ट्रीय खेल बोर्ड या किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को भी ऐसे निर्देश दे सकती है।
आरटीआई से तय होगी जवाबदेही
सभी खेल संगठन अपने काम और शक्तियों के संबंध में सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के दायरे में होंगे। क्रिकेट बोर्ड इस पहलू का विरोध करता है। उसका कहना है कि वो अपने कामकाज के लिए सरकारी पैसे परनिर्भर नहीं है। अब बात करते हैं विधेयक के अलग-अलग चैप्टर की खास बातों की।
बिल का अध्याय 3: राष्ट्रीय खेल बोर्ड के विषय में उल्लेख किया गया है। इसके तहत भारत सरकार राष्ट्रीय खेल बोर्ड की स्थापना करेगी। देश के सभी खेल संगठनों को इस राष्ट्रीय खेल बोर्ड से मान्यता लेनी होगी। राष्ट्रीय खेल बोर्ड के पास अधिकार होगा जो किसी खेल भी खेल बोर्ड को मान्यता दे सकेगा और उसको रद्द भी कर सकेगा। राष्ट्रीय खेल निर्वाचन पैनल का रोस्टर बनाने का अधिकार भी राष्ट्रीय खेल बोर्ड को होगा।
बिल का अध्याय 4: मान्यता प्राप्त खेल संगठनों के शासन के बारे में लिखा है जहां कहा गया है कि बोर्ड को किसी भी संगठन को राष्ट्रीय खेल निकाय के रूप में मान्यता देने की शक्ति होगी।
बिल का अध्याय 5: नेशनल स्पोर्ट्स ऑथोरिटी, सभी स्पोर्ट्स बॉडी के लिए एक आचार संहिता निर्धारित करेगा।
बिल का अध्याय 6: सभी खेलों में पारदर्शिता और कायदा कानून बनाए रखने के लिए आने वाली शिकायतों को दूर किया जाएगा।
बिल का अध्याय 7: नेशनल स्पोर्ट्स अथॉरिटी से मान्यता प्राप्त खेल संगठन वित्तीय लाभ उठा सकेंगे।
बिल का अध्याय 10: बिना अनुमति अब कोई भी खेल संघ या बोर्ड भारत या देश के किसी भी राज्य का नाम अपने साथ नहीं जोड़ सकेगा।
राष्ट्रीय खेल शासन अधिनियम 2025 के तहत राष्ट्रीय ओलम्पिक संघ, राष्ट्रीय पैरा ओलम्पिक संघ, सभी राष्ट्रीय खेल, क्षेत्रीय खेल महासंघ, राज्यों से लेकर जिले स्तर तक की इकाइयां इस बिल के आने के बाद खेल मंत्रालय के अंदर आ जाएंगी। हालांकि बिल में कहीं भी किसी खेल संघ का नाम नहीं लिया गया है। सूत्रों के मुताबिक विधेयक के प्रावधानों के दायरे में अन्य खेल बोर्ड, फेडरेशन और संघ की तरह ही भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) भी आएगा।
बिल के प्रावधानों के मुताबिक, स्वपोषित और स्वायत खेल बोर्ड के कार्यकलाप में हस्तक्षेप नहीं होगा। उनकी स्वायत्तता बरकरार रखी जाएगी लेकिन बोर्ड के किसी भी विवादों का निस्तारण राष्ट्रीय पंचाट के जरिये करवाने का प्रस्ताव है। इस विधेयक का मतलब किसी भी एनएसएफ पर सरकारी नियंत्रण करना नहीं है बल्कि सरकार सुशासन सुनिश्चित करने में एक सूत्रधार की भूमिका निभाना है। विधेयक का उद्देश्य समय पर चुनाव कराना, प्रशासनिक जवाबदेही और खिलाड़ियों के कल्याण के लिए एक मजबूत खेल ढांचा तैयार करना है।