अलका पाठक छात्र-छात्राओं को पढ़ा रहीं खेलों का पाठ

इनके प्रशिक्षण से उत्तर प्रदेश को मिले कई नायाब सितारे

नूतन शुक्ला

कानपुर। सर पद्मपत सिंघानिया एज्यूकेशन सेण्टर उत्तर प्रदेश में सिर्फ शिक्षा ही नहीं खेलों के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान रखता है। इसका सारा श्रेय खेलों को पूरी तरह से समर्पित अलका पाठक मिश्रा की कर्तव्यनिष्ठा और अथक मेहनत को जाता है। अलका पाठक इस संस्थान के छात्र-छात्राओं को लगभग तीन दशक से खेलों का पाठ पढ़ा रही हैं। इनके प्रयासों से जहां बेटियों को खेलों में सुरक्षित माहौल मिल रहा है वहीं वे अपने शानदार कौशल से देशभर में कानपुर का नाम रोशन कर रही हैं।

सच्चाई यह है कि खिलाड़ियों का मर्म सिर्फ एक खिलाड़ी ही समझ सकता है। अलका पाठक अपने समय की शानदार एथलीट होने के साथ खेलों की अच्छी समझ भी रखती हैं। सर पद्मपत सिंघानिया एज्यूकेशन सेण्टर में बतौर खेल शिक्षक सेवाएं दे रही अलका पाठक एथलेटिक्स खासकर क्रास कंट्री दौड़ और खो-खो में विशिष्ट योग्यता रखती हैं। इन्होंने इन खेलों में राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने के साथ ही अपने प्रशिक्षण के बल पर प्रदेश को कई नायाब सितारे दिए हैं।

अलका की खेलों में समझ को सिर्फ कानपुर ही नहीं भारतीय एथलेटिक्स संघ भी सराहता है। खेलों की पहरुआ अलका पाठक 2010 में नई दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में बतौर निर्णायक अपनी योग्यता की छाप छोड़ चुकी हैं। खेलों में इनकी निष्ठा और ईमानदारी को देखते हुए उत्तर प्रदेश सहित देशभर में होने वाली एथलेटिक्स की राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में इन्हें बतौर निर्णायक बुलाया जाता है। शारीरिक शिक्षा और खेल के क्षेत्र में अलका पाठक के योगदान को सबदूर सराहना मिलना कानपुर के लिए गर्व और गौरव की बात है।  

अलका पाठक का कहना कि समय तेजी से बदल रहा है। अब समाज भी खेलों के महत्व को न केवल स्वीकार रहा है बल्कि अभिभावक अपने बच्चों को मैदान तक ले जाने लगे हैं। वह कहती हैं कि शारीरिक शिक्षा सभी विषयों से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे छात्र-छात्राएं शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं। खेलों से नेतृत्व के गुणों का विकास होता है तथा खेल इंसान को गिरकर उठना सिखाते हैं। खेलों से ही मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास होता है।

वह कहती हैं कि युवाओं को अपनी खुद की पहचान बनानी चाहिए क्योंकि खेलों से ही स्वस्थ राष्ट्र के संकल्प को पूरा किया जा सकता है। वह कहती हैं कि छात्र-छात्राओं को मोबाइल, जंकफूड एवं कम आयु में वाहन चलाने से परहेज करना चाहिए। इसके अलावा वह नशे की बुराई से भी बचें ताकि जीवन में एक नया मुकाम हासिल कर सकें।

अलका पाठक अभिभावकों का आह्वान करते हुए कहती हैं कि वह बेटों की तरह अपनी बेटियों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। बेटियों को कमजोर न बनाकर सशक्त बनाने का प्रयास करें। बेटियों के स्वस्थ रहने से समाज स्वस्थ होगा। अलका पाठक का मानना है कि यदि बेटियों को सही अवसर मिलें तो वे अपने देश का नाम विश्व स्तर पर रोशन कर सकती हैं। वह कहती हैं कि खिलाड़ियों को जीत से अहंकार एवं हार से कभी निराश नहीं होना चाहिए। जो आज हारेगा वह कल जीतेगा भी।

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