एक पद, दो दावे! दस्तावेज बोल रहे, अब जवाबदेही की बारी

एसजीएफआई के दस्तावेजों में अमरजीत शर्मा की हैसियत पर सवाल

श्रीप्रकाश शुक्ला

नई दिल्ली। स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के पास देश का भविष्य है। इस संस्था के प्रत्येक खेल प्रमाण-पत्र का अपना महत्व है। स्कूली खेलों की इस राष्ट्रीय संस्था से सम्बन्धित दो ऐसे दस्तावेज सामने आए हैं, जोकि बड़ी विसंगति की तरफ इशारा कर रहे हैं। दोनों दस्तावेज एसजीएफआई के ही हैं, लेकिन उनमें एक महत्वपूर्ण पद को लेकर ऐसी विसंगति दिखाई देती है, जिसे सामान्य प्रशासनिक भूल कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मामला अमरजीत कुमार शर्मा के पद से जुड़ा है।

किसी पदाधिकारी का पद स्पष्ट होना केवल कार्यालय की जरूरत नहीं है। यह उन विद्यार्थियों के भविष्य का सवाल है, जिनकी खेल उपलब्धियां उन्हीं आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज होती हैं। पहला दस्तावेज एसजीएफआई के प्रथम अपीलीय प्राधिकारी द्वारा एक सितम्बर, 2026 को आरटीआई के जवाब में जारी किया गया पत्र है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 15 जुलाई, 2023 को अमरजीत शर्मा को एसजीएफआई के संविधान के क्लॉज 16 के अनुसार कार्यकारी महासचिव/अतिरिक्त प्रभार की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

दूसरा दस्तावेज 69वें राष्ट्रीय स्कूल खेलों 2025-26 का प्रमाण-पत्र है, जिसमें अमरजीत के. शर्मा के हस्ताक्षर के नीचे उनका पद महासचिव अंकित है। यहीं से एक सीधा और गम्भीर सवाल खड़ा होता है- यदि 15 जुलाई, 2023 को अमरजीत शर्मा को अतिरिक्त प्रभार दिया गया था, तो 6 जनवरी, 2026 के प्रमाण-पत्र पर उन्हें सीधे महासचिव किस आधार पर लिखा गया?

क्या 2023 के बाद उन्हें नियमित रूप से महासचिव नियुक्त किया गया था? यदि हां, तो उसका आदेश कहां है? क्या कोई चुनाव हुआ? क्या कार्यकारिणी की बैठक में प्रस्ताव पारित हुआ? क्या उस पद पर नियुक्ति अथवा निर्वाचन की कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी हुई? और यदि ऐसा कोई बाद का निर्णय हुआ ही नहीं, तो राष्ट्रीय स्तर के स्कूल खेलों के प्रमाण-पत्रों पर महासचिव  पदनाम किस अधिकार से अंकित किया गया?

आरटीआई का जवाब ही अब सबसे बड़ा दस्तावेजी सवाल

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अतिरिक्त प्रभार और महासचिव को एक ही अर्थ में नहीं देखा जा सकता। अतिरिक्त प्रभार किसी पद की जिम्मेदारी अस्थायी अथवा अतिरिक्त रूप से सौंपे जाने को दर्शाता है, जबकि महासचिव किसी व्यक्ति के नियमित पदनाम को दर्शाता है। इसलिए एसजीएफआई से यह स्पष्ट होना चाहिए कि दोनों पदनामों के बीच परिवर्तन कब और कैसे हुआ। आरटीआई के जवाब में संस्था स्वयं 15 जुलाई, 2023 की तारीख बता रही है। दूसरी ओर 6 जनवरी, 2026 के प्रमाण-पत्र में अमरजीत शर्मा को सीधे महासचिव बताया गया है। इन दोनों तारीखों के बीच लगभग ढाई वर्ष का अंतर है। क्या इस अवधि में कोई ऐसा निर्णय हुआ जिसने अतिरिक्त प्रभार को महासचिव में बदल दिया हो? यदि हुआ तो उसका दस्तावेज सार्वजनिक होना चाहिए।

यह केवल एक प्रमाण-पत्र का मामला नहीं

कोई यह तर्क दे सकता है कि प्रमाण-पत्र में पदनाम लिखने में कार्यालय स्तर पर गलती हो गई होगी। लेकिन प्रश्न यह है कि राष्ट्रीय स्कूल खेलों से जुड़े आधिकारिक प्रमाण-पत्र पर पदनाम की शुद्धता कौन सुनिश्चित करता है? ये प्रमाण-पत्र खिलाड़ियों के लिए महज कागज का टुकड़ा नहीं होते। ये उनकी खेल उपलब्धि, राष्ट्रीय स्तर पर सहभागिता और भविष्य के रिकॉर्ड का हिस्सा बनते हैं। जब किसी राष्ट्रीय खेल संस्था के महत्वपूर्ण पदाधिकारी का पदनाम ही अलग-अलग आधिकारिक दस्तावेजों में अलग-अलग दिखाई दे, तो स्वाभाविक रूप से पारदर्शिता और प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठेंगे।

 स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया को पांच सवालों का जवाब देना चाहिए

पहला- 15 जुलाई 2023 को अमरजीत शर्मा को कार्यकारी महासचिव/अतिरिक्त प्रभार देने का आदेश क्या था? दूसरा- उन्हें नियमित महासचिव कब बनाया गया? तीसरा- यदि वे नियमित महासचिव बने, तो उसकी नियुक्ति/निर्वाचन/कार्यकारिणी निर्णय की प्रमाणित प्रति कहां है? चौथा- 6 जनवरी, 2026 के राष्ट्रीय स्कूल खेल प्रमाण-पत्रों पर महासचिव पदनाम किस आधिकारिक आदेश के आधार पर अंकित किया गया? पांचवां- 1 सितम्बर 2026 के आरटीआई उत्तर में उनके पद का उल्लेख कार्यकारी महासचिव/अतिरिक्त प्रभार के रूप में क्यों किया गया, जबकि इससे पहले जनवरी 2026 के आधिकारिक प्रमाण-पत्र में उन्हें महासचिव बताया जा चुका था?

खेल प्रशासन में दस्तावेजी पारदर्शिता जरूरी

खेल संस्थाओं का प्रशासन जितना पारदर्शी होगा, खिलाड़ियों का विश्वास उतना ही मजबूत होगा। राष्ट्रीय स्तर की संस्था से जुड़े पदों और पदाधिकारियों की जानकारी में स्पष्टता होना अनिवार्य है। खेलपथ किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का दावा नहीं कर रहा। सवाल केवल इतना है कि जब एक ही संस्था के दो आधिकारिक दस्तावेजों में एक ही व्यक्ति का पद अलग-अलग दर्ज है, तो संस्था स्वयं इस अंतर को स्पष्ट करे क्योंकि सवाल अमरजीत शर्मा का नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता का है।

यदि यह केवल कार्यालयीन भूल है तो एसजीएफआई उसे स्पष्ट करे। यदि पद में वास्तविक परिवर्तन हुआ है तो उसका आदेश सामने रखे। लेकिन दोनों दस्तावेजों को एक साथ रखकर उठ रहे सवालों को अनुत्तरित नहीं छोड़ा जा सकता। खेल प्रशासन में पदनाम भी रिकॉर्ड होता है और रिकॉर्ड जवाबदेही भी मांगता है। दस्तावेज सामने हैं। अब जवाब भी दस्तावेज के साथ होना चाहिए।

दस्तावेज बनाम दस्तावेज- एसजीएफआई  के 1 सितम्बर, 2026 के आरटीआई उत्तर में: अमरजीत शर्मा- कार्यकारी महासचिव/अतिरिक्त प्रभार जबकि 69वें राष्ट्रीय स्कूल खेल 2025-26 के प्रमाण-पत्रों में: अमरजीत के. शर्मा- महासचिव।

एसजीएफआई से सीधा सवाल- 15 जुलाई 2023 को अतिरिक्त प्रभार मिलने के बाद अमरजीत शर्मा को नियमित महासचिव कब और किस आदेश से बनाया गया? यदि ऐसा कोई आदेश है तो उसे सार्वजनिक किया जाए। यदि नहीं है, तो राष्ट्रीय प्रतियोगिता के प्रमाण-पत्र पर महासचिव पदनाम कैसे आया? एक संस्था। एक पदाधिकारी। दो आधिकारिक दस्तावेज। दो अलग पदनाम। अब एसजीएफआई को बताना चाहिए-सही क्या है?

सवाल केवल एक पद का नहीं, लाखों खेल प्रतिभाओं के भविष्य का है

स्कूल खेल किसी भी देश की खेल व्यवस्था की पहली और सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी हैं। राष्ट्रीय स्कूल खेलों में भाग लेने वाले विद्यार्थियों के प्रमाण-पत्र उनके लिए आगे की पढ़ाई, खेल अवसरों, छात्रवृत्ति और खेल-करियर में महत्वपूर्ण दस्तावेज बन सकते हैं। ऐसे में यदि किसी राष्ट्रीय खेल संस्था के महत्वपूर्ण पदाधिकारी के अधिकार और पदनाम को लेकर स्वयं संस्था के दो आधिकारिक दस्तावेज अलग-अलग तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हों, तो चिन्ता केवल प्रशासनिक नहीं रह जाती।

सवाल उठता है- यदि अमरजीत शर्मा के हस्ताक्षर से जारी प्रमाण-पत्रों अथवा अन्य आधिकारिक अभिलेखों पर भविष्य में कोई कानूनी या प्रशासनिक प्रश्न खड़ा होता है, तो उन प्रमाण-पत्रों पर भरोसा करने वाले विद्यार्थियों की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या किसी खिलाड़ी को अपनी उपलब्धि का प्रमाण-पत्र इसलिए संदेह के घेरे में देखना पड़ेगा कि उसे जारी करने वाले अधिकारी के पद को लेकर संस्था के दस्तावेज ही एकमत नहीं हैं?

लाखों स्कूल खिलाड़ियों के भविष्य के साथ किसी भी प्रकार का प्रशासनिक प्रयोग स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिए एसजीएफआई को केवल अमरजीत शर्मा के पद का स्पष्टीकरण ही नहीं देना चाहिए, बल्कि यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि उनके हस्ताक्षर से जारी प्रमाण-पत्र और अन्य आधिकारिक दस्तावेज पूरी तरह वैध, अधिकृत और सुरक्षित हैं या नहीं। स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के चुनावों और इसके संविधान की व्यवस्था के अनुसार, कोई भी पदाधिकारी बिना किसी चुनावी प्रक्रिया या संवैधानिक बदलाव के सीधे उच्च पद पर नहीं बैठ सकता। डॉ. अमरजीत कुमार शर्मा के संयुक्त सचिव से महासचिव बनने की प्रक्रिया को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है-

लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया: जनवरी 2023 में दिल्ली में राष्ट्रीय खेल विकास संहिता के तहत स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के आधिकारिक चुनाव आयोजित किए गए थे। इस पूरी चुनाव प्रक्रिया में डॉ. अमरजीत कुमार शर्मा को संयुक्त सचिव चुना गया था। उस समय मूल रूप से कीर्ति पंवार को महासचिव चुना गया था।

कार्यकारी परिषद और आमसभा (एजीएम) का निर्णय: किसी भी खेल महासंघ के संविधान के नियमों के अनुसार, यदि कार्यकाल के बीच में कोई मुख्य पदाधिकारी (जैसे महासचिव) अपने पद से इस्तीफा देता है, अक्षम होता है, या प्रशासनिक फेरबदल होता है, तो महासंघ की एग्जीक्यूटिव कमेटी या आमसभा के पास यह अधिकार होता है कि वह मौजूदा कार्यकारी सदस्यों में से ही किसी योग्य व्यक्ति को उस जिम्मेदारी के लिए नियुक्त या पदोन्नत करे।

पुनर्गठन और सर्वसम्मति से जिम्मेदारी: एसजीएफआई की बाद की बैठकों और प्रशासनिक पुनर्गठन के दौरान, वर्तमान अध्यक्ष दीपक कुमार के नेतृत्व वाली प्रबंध समिति ने खेल मंत्रालय के दिशानिर्देशों के तहत डॉ. अमरजीत कुमार शर्मा को महासचिव का प्रभार सौंपने का निर्णय लिया। यह निर्णय फेडरेशन के सदस्यों की सर्वसम्मति और प्रशासनिक प्रस्ताव के जरिए हुआ। अमरजीत कुमार शर्मा बिना नया चुनाव लड़े सीधे 'निर्वाचित महासचिव' नहीं बने हैं बल्कि, वे चुने गए संयुक्त सचिव ही हैं, जिन्हें महासंघ के आंतरिक नियमों और अध्यक्ष की प्रबंध समिति द्वारा महासचिव का कार्यकारी प्रभार सौंपा गया है।

अभिभावकों और छात्र-छात्राओं को सलाहः देखा जाए तो पिछले तीन नेशनल स्कूल गेम्स (67वें,68वें और 69वें) में देश के लगभग तीन लाख छात्र-छात्राओं को प्रमाण पत्र दिए गए, जिनमें अमरजीत कुमार शर्मा के हस्ताक्षर हो सकते हैं। यह गलती नहीं जानबूझकर किया गया कूटरचित षड्यंत्र प्रतीक होता है। खेलपथ सभी अभिभावकों तथा छात्र-छात्राओं को सुझाव देता है कि वे खेल मंत्री भारत सरकार तथा खेल सचिव भारत सरकार को ईमेल पर जानकारी जरूर दें, हो सकता है कि आपके साथ भी कुछ ऐसा फर्जीवाड़ा हुआ हो।

 

 

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