महिला शक्ति ने बदली भारतीय खेलों की तस्वीर
क्रिकेट से लेकर एथलेटिक्स तक चमकी बेटियां
डॉ. जया द्विवेदी
बरेली। भारतीय खेलों की बदलती तस्वीर में महिला खिलाड़ियों की भूमिका आज सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। कभी खेल के मैदान को पुरुषों का क्षेत्र मानने वाली सामाजिक सोच को भारतीय बेटियों ने अपनी मेहनत, प्रतिभा और अदम्य आत्मविश्वास से बदल दिया है। एशियाई खेलों में भारतीय महिला खिलाड़ियों का प्रदर्शन इस बदलाव का जीवंत प्रमाण है।
2022 के हांगझोऊ एशियाई खेल भारत के लिए ऐतिहासिक रहे। भारत ने पहली बार 100 से अधिक पदक जीतते हुए कुल 107 पदक अपने नाम किए। इनमें भारतीय महिलाओं ने 45 पदक जीते, जिसमें 9 स्वर्ण, 17 रजत और 19 कांस्य पदक शामिल थे। यह आंकड़ा केवल पदकों की संख्या नहीं, बल्कि भारतीय महिला खेल शक्ति के निरंतर विस्तार की कहानी भी कहता है।
हांगझोऊ में महिला क्रिकेट टीम ने स्वर्ण पदक जीतकर एक नया इतिहास रचा। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि एशियाई खेलों में महिला क्रिकेट को मिले मंच ने भारतीय खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का एक और बड़ा अवसर दिया। एथलेटिक्स में पारुल चौधरी जैसी खिलाड़ियों ने भारत की पदक उम्मीदों को मजबूती दी।
शूटिंग में ईशा सिंह और अन्य युवा निशानेबाजों ने शानदार प्रदर्शन किया। तीरंदाजी, बैडमिंटन, कुश्ती, मुक्केबाजी, स्क्वैश और अन्य खेलों में भी भारतीय महिलाओं ने यह संदेश दिया कि अब भारतीय खेल शक्ति किसी एक-दो खेल तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि नई पीढ़ी की खिलाड़ी कम उम्र में ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर आत्मविश्वास के साथ उतर रही हैं। यह परिवर्तन भारतीय खेल व्यवस्था में प्रतिभा खोज, खेल विज्ञान, बेहतर प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के बढ़ते अवसरों का परिणाम भी है।
उपलब्धियों से आगे की चुनौती
पदक जीतना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन अब भारतीय महिला खिलाड़ियों के सामने अगली चुनौती इन सफलताओं को निरंतरता देना है। एशिया में चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश लम्बे समय से खेलों में मजबूत आधार रखते हैं। ऐसे में भारत को केवल प्रतिभाशाली खिलाड़ियों पर निर्भर रहने के बजाय मजबूत खेल प्रणाली तैयार करनी होगी। महिला खिलाड़ियों के लिए गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण केंद्र, योग्य प्रशिक्षक, खेल विज्ञान विशेषज्ञ, पोषण विशेषज्ञ और मानसिक तैयारी की सुविधाएं हर स्तर पर उपलब्ध कराना जरूरी है। ग्रामीण और छोटे शहरों की प्रतिभाओं को विशेष अवसर मिलें, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भारतीय महिला खिलाड़ियों की सफलता का प्रभाव पदक तालिका से कहीं बड़ा है। जब कोई बेटी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में तिरंगा लेकर उतरती है तो वह हजारों दूसरी बेटियों के लिए प्रेरणा बनती है। खेलों में महिलाओं की सफलता ने परिवारों की सोच बदली है और बेटियों के खेल में आगे बढ़ने के रास्ते खोले हैं। यही कारण है कि महिला खेलों को केवल पदक की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। खेल महिला सशक्तीकरण, आत्मविश्वास, नेतृत्व और स्वस्थ समाज निर्माण का भी माध्यम हैं।
आगामी एशियाई खेलों में भारतीय महिला खिलाड़ियों से अपेक्षाएं निश्चित रूप से पहले से अधिक हैं। भारतीय महिला हॉकी टीम से स्वर्ण पदक की उम्मीद की जा रही है और टीम भी इसी लक्ष्य के साथ तैयारी कर रही है। एथलेटिक्स में कई खिलाड़ियों से पदक की उम्मीदें हैं। शूटिंग, तीरंदाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन और क्रिकेट जैसे खेलों में भी भारत की महिला खिलाड़ी मजबूत दावेदार बनकर उभर रही हैं। लेकिन अपेक्षाओं का दबाव खिलाड़ियों की प्रतिभा पर हावी नहीं होना चाहिए। उनसे पदक की उम्मीद जरूर हो, मगर उन्हें स्वस्थ, सुरक्षित और सकारात्मक वातावरण देना उससे भी अधिक जरूरी है।
जरूरत है 'पदक से आगे' सोचने की
भारत को अब महिला खिलाड़ियों के लिए ऐसी खेल संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें प्रतिभा को अवसर मिले और प्रतिभा के रास्ते में आर्थिक, सामाजिक या सुविधाओं की कमी बाधा न बने। स्कूल स्तर से ही खेल और शारीरिक शिक्षा को मजबूत करना होगा। गांव-कस्बों में खेल मैदान और प्रशिक्षक उपलब्ध कराने होंगे। बेटियों को नियमित प्रतियोगिताओं में भाग लेने का अवसर देना होगा। तभी एशियाई खेलों की एक सफल टीम तैयार करने के बजाय हम देशभर में हजारों सम्भावित चैम्पियन तैयार कर सकेंगे।
भारतीय महिला खिलाड़ियों ने साबित कर दिया है कि उन्हें अवसर मिलें तो वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा ऊंचा कर सकती हैं। अब जिम्मेदारी खेल व्यवस्था, समाज और परिवारों की है कि वे उनकी उड़ान को और मजबूत पंख दें। एशियाई खेलों में भारतीय महिला खिलाड़ियों से पदकों की उम्मीद स्वाभाविक है, लेकिन उससे भी बड़ी उम्मीद यह है कि भारतीय बेटियां आने वाली पीढ़ी के लिए खेलों को सपनों का नहीं, बल्कि सम्भावनाओं का मैदान बनाएं। यही भारतीय महिला खेल शक्ति की असली जीत होगी।
