हर खेल, हर मैदान और हर प्रतिभा का शहर बने कानपुर
यूपी के महानगर पर ग्रीन पार्क की चमक से आगे बढ़ने की चुनौती
यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं, अवसर की कमी चिन्ता का विषय
सचिन शुक्ला
कानपुर। उत्तर प्रदेश का महानगर कानपुर क्रिकेट को छोड़ अन्य खेलों में बेतरतीब तरीके से खेल रहा है। सबदूर की तरह यहां भी क्रिकेट सबसे अच्छा खेल रही है। इस खेल की मेजबानी में हालांकि उसे लखनऊ से चुनौती मिल रही है लेकिन कानपुर का देश के खेल मानचित्र में अपना अलग मुकाम और पहचान है। गंगा किनारे आबाद ग्रीन पार्क के ऐतिहासिक मैदान से भारतीय क्रिकेट की कई गौरवगाथाएं जुड़ी हैं। जिला प्रशासन भी कानपुर के इस क्रीड़ांगन को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की महत्वपूर्ण धरोहर मानता है।
अब सवाल यह कि क्या कानपुर की खेल पहचान सिर्फ ग्रीन पार्क तक सीमित रहनी चाहिए? यही वह सवाल है जिस पर कानपुर महानगर और पूरे जिले को गंभीरता से विचार करना होगा। विरासत बड़ी है, लेकिन वर्तमान की कसौटी भी बड़ी है। ग्रीन पार्क का गौरव निर्विवाद है। यहां अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के अनेक ऐतिहासिक अध्याय लिखे गए हैं। अब इसके व्यापक पुनर्विकास की योजना भी सामने है। 2026 में राज्य सरकार ने इसके कायाकल्प के लिए 350 करोड़ रुपये की योजना को आगे बढ़ाया है, जिसका उद्देश्य पुराने ढांचे और जल निकासी जैसी समस्याओं को दूर करना है। यह स्वागतयोग्य कदम है।
सच कहें तो एक अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम का कायाकल्प पूरे जिले की खेल-व्यवस्था का कायाकल्प नहीं होता। कानपुर को ऐसे दर्जनों मैदान, प्रशिक्षक, खेल विज्ञान सुविधाएं और नियमित प्रतियोगिताएं चाहिए जहां मोहल्लों, कस्बों और गांवों की प्रतिभाएं अपना पहला कदम रख सकें। कानपुर की मिट्टी ने क्रिकेट के साथ-साथ हॉकी, एथलेटिक्स, फुटबॉल, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, कबड्डी और अन्य खेलों के खिलाड़ियों को अवसर दिए हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर भी खेलों में उल्लेखनीय प्रदर्शन कर रहा है। 2025 के इंटर-आईआईटी मुकाबलों में उसके खिलाड़ियों ने एथलेटिक्स, हॉकी, स्क्वैश, टेनिस और बास्केटबॉल सहित कई खेलों में पदक जीते थे। 2026 के राष्ट्रीय पैरा स्पोर्ट्स फेस्ट में भी आईआईटी कानपुर के खिलाड़ियों ने क्रिकेट, एथलेटिक्स और बैडमिंटन में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। ये उपलब्धियां बताती हैं कि कानपुर में प्रतिभाएं हैं। सवाल प्रतिभा का नहीं, प्रतिभा को लगातार तराशने वाली व्यवस्था का है।
गांव और कस्बे खेल की अगली प्रयोगशाला बनें
कानपुर महानगर के साथ कानपुर देहात की ओर भी खेल की दृष्टि से गम्भीरता से देखने की जरूरत है। हर प्रतिभा ग्रीन पार्क तक नहीं पहुंच सकती। बहुत-से बच्चे ऐसे हैं जिनके पास प्रतिभा तो है, लेकिन न उचित मैदान है, न प्रशिक्षित कोच, न खेल सामग्री और न ही प्रतियोगिता का नियमित अवसर। इसलिए जिले में 'एक ब्लॉक—एक प्रमुख खेल केन्द्र' जैसी अवधारणा विकसित की जा सकती है। प्रत्येक विकासखंड में कम से कम एक ऐसा खेल केन्द्र हो जहां एथलेटिक्स, कबड्डी, फुटबॉल, हॉकी, वॉलीबॉल जैसे लोकप्रिय खेलों की नियमित प्रशिक्षण व्यवस्था हो।
स्कूल खेलों को केवल वार्षिक समारोह न बनाया जाए
खेल-व्यवस्था को मजबूत करने का सबसे प्रभावी रास्ता स्कूलों से होकर जाता है। आज आवश्यकता है कि विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा को केवल औपचारिक विषय न माना जाए। हर विद्यालय में प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा शिक्षक, नियमित खेल पीरियड, योग, फिटनेस परीक्षण और अंतर-विद्यालय प्रतियोगिताओं की मजबूत व्यवस्था हो, क्योंकि प्रतिभा खोजने का सबसे बड़ा मैदान कोई स्टेडियम नहीं, बल्कि विद्यालय है। यदि हजारों विद्यालयों में नियमित खेल होंगे तो उन्हीं में से अगले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निकलेंगे।
बालिकाओं का रुझान खेलों की तरफ बढ़ाना जरूरी
कानपुर की खेल-यात्रा तब तक पूरी नहीं मानी जा सकती जब तक बेटियों को मैदान पर बराबर अवसर न मिलें। महिला क्रिकेट, हॉकी, एथलेटिक्स, कुश्ती, बैडमिंटन, कबड्डी और अन्य खेलों के लिए अलग प्रशिक्षण शिविर, सुरक्षित अभ्यास स्थल, महिला प्रशिक्षकों की उपलब्धता और नियमित प्रतियोगिताएं आयोजित की जानी चाहिए। जिस शहर की बेटियां मैदान पर आगे बढ़ती हैं, वही शहर वास्तव में खेल संस्कृति वाला शहर कहलाता है।
खेल विज्ञान से जोड़ना होगा प्रशिक्षण
आज का खेल केवल मैदान में पसीना बहाने का नाम नहीं है। पोषण, फिटनेस, मनोवैज्ञानिक तैयारी, चोट से बचाव, रिकवरी और प्रदर्शन विश्लेषण आधुनिक खेल के अनिवार्य हिस्से हैं। कानपुर जैसे बड़े औद्योगिक और शैक्षणिक केन्द्र में स्पोर्ट्स साइंस सेंटर विकसित किया जा सकता है। आईआईटी कानपुर जैसे संस्थानों की विशेषज्ञता और जिला खेल व्यवस्था के बीच सहयोग की नई मिसाल बनाई जा सकती है। इससे खिलाड़ियों को प्रशिक्षण के साथ विज्ञान का लाभ भी मिलेगा।
ग्रीन पार्क को धरोहर से खेल-परिसर का मॉडल बनाना होगा
ग्रीन पार्क का पुनर्विकास केवल दर्शक क्षमता बढ़ाने तक सीमित न रहे। इसे युवा खिलाड़ियों के लिए प्रशिक्षण, कोचिंग, खेल विज्ञान, संग्रहालय, खेल पुस्तकालय और प्रतिभा विकास से जोड़ना चाहिए। तब ग्रीन पार्क सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मैचों का मैदान नहीं रहेगा, बल्कि कानपुर की खेल संस्कृति का केंद्र बन सकता है।
अब सवाल मैचों की संख्या नहीं, खिलाड़ियों की संख्या का है
कानपुर में कितने अंतरराष्ट्रीय मैच हुए, यह गौरव की बात है। लेकिन आने वाले वर्षों में असली सवाल यह होना चाहिए कि कितने नए खिलाड़ी तैयार हुए? कितने स्कूलों में नियमित खेल शुरू हुए? कितने गांवों तक खेल सुविधाएं पहुंचीं? कितनी बेटियों ने मैदान संभाला? कितने प्रशिक्षित कोच नियुक्त हुए? और कितने खिलाड़ियों को रोजगार तथा आगे बढ़ने का रास्ता मिला? यही आंकड़े कानपुर की वास्तविक खेल-तस्वीर बताएंगे।
कानपुर के पास इतिहास है, ग्रीन पार्क है, शैक्षणिक संस्थान हैं, औद्योगिक क्षमता है और प्रतिभाशाली युवा हैं। कमी यदि कहीं है तो इन संसाधनों को एक समन्वित खेल मिशन में बदलने की है। कानपुर को अब केवल 'क्रिकेट का शहर' बने रहने से आगे बढ़ना होगा। उसे 'हर खेल, हर मैदान और हर प्रतिभा का शहर' बनना होगा। ग्रीन पार्क की रोशनी तभी सार्थक होगी, जब उसकी चमक महानगर के छोटे मैदानों और जिले के गांवों तक पहुंचे। कानपुर की अगली खेल क्रांति किसी बड़े स्टेडियम में नहीं, किसी छोटे मैदान में खेल रहे उस अनाम बच्चे से शुरू होगी, जिसे आज सिर्फ एक अवसर की जरूरत है।
