देश की शारीरिक शिक्षा: मैदान गायब, फाइलें दौड़ रहीं
देश को स्वस्थ नागरिक चाहिए या केवल स्वस्थ भारत के नारे?
खेलपथ शब्द-सहयात्री
नई दिल्ली। देश में खेलों का भविष्य उज्ज्वल है। कम-से-कम सरकारी भाषणों में तो जरूर। विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा को महत्व देने की बातें होती हैं। नई शिक्षा नीति में खेल और शारीरिक शिक्षा की उपयोगिता बताई जाती है। स्वस्थ भारत का सपना भी दिखाया जाता है। लेकिन जब बच्चे मैदान की ओर देखते हैं तो कई जगह मैदान दिखाई नहीं देता, और जहां मैदान है वहां शारीरिक शिक्षा शिक्षक दिखाई नहीं देते। हाँ, कागजों पर व्यवस्था शानदार है।
हमारे यहां खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। कमी अगर है तो उसे पहचानने, तराशने और आगे बढ़ाने वाली व्यवस्थित सोच की। बच्चे दौड़ना चाहते हैं, लेकिन विद्यालय में दौड़ने के लिए मैदान नहीं। बच्चे खेलना चाहते हैं, लेकिन खेल शिक्षक नहीं। योग करना चाहते हैं, लेकिन योग प्रशिक्षक नहीं। फिर भी हम गर्व से कहते हैं- भारत खेल महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है।
वाह! जिस देश में बच्चा खेल के पीरियड में भी दूसरे विषय की कॉपी पूरी करता हो, वहां खेल महाशक्ति बनने का सपना देखना भी अपने आप में एक बड़ा खेल है। शारीरिक शिक्षा के साथ देश में सबसे बड़ा खेल शायद यही हो रहा है कि उसे कभी पूरी तरह खेल शिक्षा माना ही नहीं गया। गणित के शिक्षक चाहिए- तुरंत भर्ती की चर्चा। विज्ञान के शिक्षक चाहिए- व्यवस्था सक्रिय। भाषा के शिक्षक चाहिए- पदों की बात। लेकिन शारीरिक शिक्षा शिक्षक? देखेंगे, प्रस्ताव भेजा गया है, विचाराधीन है, भर्ती प्रक्रिया शीघ्र शुरू होगी, और इस ‘शीघ्र’ की दौड़ में कई पीढ़ियां विद्यालय से निकल जाती हैं। बच्चा जरूर बड़ा हो जाता है, लेकिन उसकी खेल प्रतिभा छोटी रह जाती है।
देश में खेलों के लिए योजनाएं बनती हैं। समितियां बनती हैं। घोषणाएं होती हैं। बजट की बातें होती हैं। समारोह होते हैं। पुरस्कार दिए जाते हैं। लेकिन स्कूल के मैदान में खड़ा होकर कोई यह पूछने वाला कम दिखाई देता है कि-“इस बच्चे को रोज खेलने का अवसर कौन देगा?” खेल प्रतिभा भाषण से नहीं निकलती। वह मैदान से निकलती है। और मैदान तक पहुंचाने के लिए शिक्षक चाहिए। यही वह साधारण-सी बात है जिसे हमारी जटिल व्यवस्था अक्सर भूल जाती है।
हम बच्चों को मोबाइल से दूर रहने की सलाह देते हैं, लेकिन उन्हें मैदान तक पहुंचाने की व्यवस्था नहीं करते। हम फिट इंडिया की बात करते हैं, लेकिन स्कूल में नियमित शारीरिक शिक्षा की स्थिति पर गम्भीरता से चर्चा नहीं करते। हम ओलम्पिक पदकों का हिसाब लगाते हैं, लेकिन यह हिसाब नहीं लगाते कि देश के कितने स्कूलों में प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा शिक्षक नियमित रूप से बच्चों के साथ मैदान पर खड़े हैं। यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई किसान फसल की पैदावार बढ़ाने पर सम्मेलन करे, लेकिन खेत में बीज डालना भूल जाए।
योग को भारतीय परम्परा की अमूल्य देन बताते हुए हम पूरी दुनिया को योग दिवस मनाने के लिए प्रेरित करते हैं। बहुत अच्छी बात है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बच्चे को विद्यालय में नियमित और प्रशिक्षित मार्गदर्शन मिल रहा है? अगर नहीं, तो योग दिवस पर फोटो खिंचवाने से अधिक जरूरी है कि योग पूरे वर्ष बच्चे की दिनचर्या का हिस्सा बने। इसी तरह खेल दिवस पर भाषण देने से अधिक जरूरी है कि वर्ष के 365 दिनों में बच्चों के पास खेलने का अवसर हो।
अब समय आ गया है कि शारीरिक शिक्षा को ‘अतिरिक्त गतिविधि’ की मानसिकता से बाहर निकाला जाए। हर विद्यालय में पर्याप्त खेल सुविधा, प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा शिक्षक, योग का व्यवस्थित प्रशिक्षण, नियमित खेल गतिविधियां, प्रतिभा पहचान की व्यवस्था को शिक्षा व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। क्योंकि खेल केवल पदक पैदा नहीं करता, इंसान बनाता है। खेल अनुशासन देता है, सहयोग सिखाता है, हार को स्वीकारना सिखाता है और जीत के बाद विनम्र रहना भी।
अंतिम सवाल- सरकारें स्वस्थ भारत चाहती हैं। विद्यालय अच्छे नागरिक चाहते हैं। माता-पिता स्वस्थ और सफल बच्चे चाहते हैं। बच्चे खेलना चाहते हैं। तो फिर समस्या आखिर है कहां? शायद समस्या उस सोच में है जो आज भी शारीरिक शिक्षा को शिक्षा की मुख्य धारा के बजाय उसके किनारे खड़ा देखती है। अब जरूरत है कि फाइलें दौड़ना बंद करें और बच्चे मैदान में दौड़ें। क्योंकि देश का भविष्य वातानुकूलित कमरों में बैठकर फिट नहीं होगा। उसे मैदान में पसीना बहाना होगा। और जब तक हर विद्यालय का मैदान बच्चों की आवाज से नहीं गूंजता, तब तक ‘स्वस्थ राष्ट्र’ का संकल्प अधूरा ही रहेगा। खेलपथ का सवाल सीधा है- देश को स्वस्थ नागरिक चाहिए या केवल स्वस्थ भारत के नारे?
