पुणे की डायना कैसे बनीं भारत की पहली महिला फेरारी रेसर?

समाज ने रोका, किस्मत ने परखा: दो बच्चों की मां ने लिखी नई पटकथा

खेलपथ संवाद

पुणे। शिक्षिका बनने की तैयारी कर रही एक भारतीय महिला ने जिन्दगी का सबसे बड़ा जोखिम उठाया और मोटरस्पोर्ट्स की दुनिया में कदम रखा। ताने, हार, दुर्घटनाएं और असफलताएं झेलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। आज वही महिला अंतरराष्ट्रीय फेरारी रेस में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली भारतीय महिला बन चुकी हैं। यह कहानी सिर्फ रफ्तार की नहीं बल्कि हिम्मत, विश्वास और सपनों को सच करने की है।

एक तरफ सुरक्षित नौकरी थी, दूसरी तरफ रफ्तार से भरी अनिश्चित दुनिया। एक तरफ क्लासरूम में बच्चों को पढ़ाने का सपना था, तो दूसरी तरफ रेसिंग ट्रैक पर खुद को साबित करने की चुनौती। ज्यादातर लोग शायद सुरक्षित रास्ता चुनते, लेकिन डायना पुंडोले ने वह रास्ता चुना, जिस पर न मंजिल तय थी और न ही सफलता की गारंटी। आज वही डायना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फेरारी चलाने वाली पहली भारतीय महिला बन चुकी हैं, लेकिन इस उपलब्धि तक पहुंचने का सफर जितना चमकदार दिखता है, उतना आसान कभी नहीं था।

पुणे में पली-बढ़ीं डायना के भीतर रेसिंग का जुनून बचपन से था। उनके पिता फॉर्मूला-1 के बड़े प्रशंसक थे और शायद ही कोई रेस मिस करते हों। सात साल की उम्र में डायना ने पहली बार गो-कार्टिंग की और वहीं से स्पीड के प्रति उनका लगाव शुरू हुआ। समय बीतने के साथ उनके पिता इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनका सपना डायना की सबसे बड़ी ताकत बन गया। वह कई बार कह चुकी हैं कि आज भी हर रेस में उन्हें अपने पिता का साथ महसूस होता है। मुश्किल समय में वही यादें उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती हैं।

डायना ने अंग्रेजी साहित्य और फोनेटिक्स में मास्टर्स किया था। पढ़ाई पूरी होने के बाद वह एक स्कूल में शिक्षिका बनने वाली थीं। नौकरी लगभग तय हो चुकी थी। उसी दौरान उन्हें महिलाओं के लिए आयोजित मोटरस्पोर्ट्स टैलेंट हंट के बारे में पता चला। करीब 200 प्रतिभागियों के बीच उन्होंने अपनी जगह बनाई और यहीं से जिंदगी ने नया मोड़ ले लिया। उन्होंने सुरक्षित नौकरी छोड़ दी और रेसिंग को अपना करियर बनाने का फैसला किया।

रेसिंग की दुनिया में कदम रखते ही चुनौतियां सामने थीं। कई बार वह रेस हार गईं, कई बार आखिरी स्थान पर रहीं और कई दुर्घटनाओं का भी सामना करना पड़ा। लोगों ने कहा कि मोटरस्पोर्ट्स महिलाओं के लिए नहीं है। कुछ ने उन्हें घर लौट जाने की सलाह दी, तो कुछ ने यहां तक कह दिया कि वह इस खेल के लिए बनी ही नहीं हैं। लेकिन डायना ने हर आलोचना को अपनी ताकत बनाया। उन्होंने रेसिंग नहीं छोड़ी। लगातार अभ्यास किया, खुद को बेहतर बनाया और धीरे-धीरे वही लोग उनकी तारीफ करने लगे जो कभी उन पर सवाल उठाते थे।

साल 2024 में उन्होंने एमआरएफ नेशनल रेसिंग चैम्पियनशिप के सैलून कार वर्ग का खिताब जीतकर इतिहास रच दिया। इसके बाद उन्हें फेरारी चैलेंज मिडिल ईस्ट में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। उन्होंने अबू धाबी के यास मरीना, बहरीन इंटरनेशनल सर्किट और जेद्दा कॉर्निश जैसे प्रतिष्ठित फॉर्मूला-1 ट्रैक पर फेरारी 296 चैलेंज कार दौड़ाई। अपने पहले ही अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में चौथे स्थान पर रहीं, बहरीन में दूसरे स्थान पर फिनिश किया और जेद्दा के चुनौतीपूर्ण स्ट्रीट सर्किट पर भी दूसरा स्थान हासिल कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

डायना सिर्फ एक रेसर नहीं हैं, बल्कि दो बच्चों की मां भी हैं। परिवार और रेसिंग के बीच संतुलन बनाते हुए वह रोज करीब दो घंटे फिटनेस, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और मानसिक तैयारी करती हैं। रेस से पहले वह ट्रैक के हर मोड़ की कल्पना अपने दिमाग में कई बार करती हैं, ताकि असली मुकाबले में कोई चूक न हो।

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