हरियाणा है भारतीय मुक्केबाजी की धड़कन, भिवानी विशेष
भारत के सात स्वर्ण पदकों में से छह स्वर्ण हरियाणा के नाम
हरियाणा से निकले छह चैम्पियन तो राजस्थान ने भी बढ़ाया मान
खेलपथ संवाद
चंडीगढ़। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों की बॉक्सिंग रिंग में भारत ने ऐसा इतिहास रचा, जिसकी सबसे मजबूत पटकथा हरियाणा के मुक्केबाजों ने लिखी। भारतीय मुक्केबाजों ने पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों में सात स्वर्ण और कुल 10 पदक (7 स्वर्ण, 3 रजत) जीतकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। इस ऐतिहासिक सफलता में हरियाणा की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही। भारत के सात स्वर्ण पदकों में से छह स्वर्ण हरियाणा के मुक्केबाजों ने जीते।
भिवानी ने एक बार फिर साबित किया कि उसे भारतीय मुक्केबाजी का 'लिटिल क्यूबा' क्यों कहा जाता है, जबकि राज्य की नई पीढ़ी ने यह भरोसा भी मजबूत किया कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बड़ी उम्मीदें आज भी हरियाणा से ही जुड़ी हैं। भिवानी की प्रीति पंवार, जैसमीन लम्बोरिया और सचिन सिवाच, झज्जर की प्रिया घनघस तथा हरियाणा के साक्षी चौधरी और अंकुश पंघाल शामिल हैं। यह सफलता केवल पदकों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि उस मजबूत खेल संस्कृति, प्रशिक्षण व्यवस्था और वर्षों की मेहनत की कहानी भी है, जिसने हरियाणा को भारतीय मुक्केबाजी का सबसे बड़ा केंद्र बनाया।
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल भारतीय मुक्केबाजी के इतिहास में मील का पत्थर बन गए। भारत ने पहली बार किसी एक संस्करण में 10 पदक जीतकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। इनमें सात स्वर्ण और तीन रजत पदक शामिल हैं। इससे पहले भारत कभी भी किसी एक राष्ट्रमंडल खेल में मुक्केबाजी में सात स्वर्ण पदक नहीं जीत पाया था।
सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि भारत के सात स्वर्ण पदकों में से छह हरियाणा के मुक्केबाजों ने जीते। इनमें तीन स्वर्ण विजेता अकेले भिवानी से रहे। राजस्थान की अरुंधति चौधरी ने भी स्वर्ण पदक जीता, जबकि लवलीना बोरगोहाईं, जदुमणि सिंह और नरेंद्र बरवाल ने रजत पदक जीतकर भारत के ऐतिहासिक अभियान को मजबूती दी।
हरियाणा: जहां मुक्केबाजी केवल खेल नहीं, एक पहचान है
हरियाणा लम्बे समय से भारतीय मुक्केबाजी का सबसे मजबूत केंद्र रहा है। यहां गांवों में सुबह की शुरुआत दौड़, रस्सीकूद और पंचिंग बैग से होती है। खेल यहां केवल करियर नहीं, बल्कि सम्मान और पहचान का विषय है। इस परंपरा का सबसे बड़ा केंद्र भिवानी है, जिसे भारतीय मुक्केबाजी का 'लिटिल क्यूबा' कहा जाता है। 2008 बीजिंग ओलम्पिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकांश मुक्केबाज भिवानी की प्रशिक्षण व्यवस्था से निकले थे। इसके बाद विजेंदर सिंह, अखिल कुमार, विकास कृष्ण, जैसमीन लम्बोरिया, प्रीति पवार और सचिन सिवाच जैसे खिलाड़ियों ने इस शहर की पहचान को और मजबूत किया। हरियाणा सरकार की खेल नीति, बेहतर प्रशिक्षण सुविधाएं, नकद पुरस्कार और ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत खेल संस्कृति ने राज्य को मुक्केबाजी का सबसे बड़ा केंद्र बना दिया है।
हरियाणा के छह गोल्डन पंचः प्रीति पंवार भिवानी 54 किलोग्राम, जैसमीन लम्बोरिया भिवानी 57 किलोग्राम सचिन सिवाच भिवानी 60 किलोग्राम, प्रिया घनघस झज्जर 60 किलोग्राम, साक्षी चौधरी हरियाणा 51 किलोग्राम, अंकुश पंघाल हरियाणा 80 किलोग्राम। भिवानी ने तीन स्वर्ण विजेता देकर एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय मुक्केबाजी की सबसे मजबूत परम्परा आज भी उसी मिट्टी से निकलती है।
प्रीति पवार: भिवानी की बेटी जिसने भारत को दिलाया पहला स्वर्ण
ग्लासगो में भारतीय मुक्केबाजी के स्वर्णिम अभियान की शुरुआत भिवानी की प्रीति पवार ने की। महिलाओं के 54 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में उन्होंने कनाडा की स्कारलेट डेलगाडो को एकतरफा अंदाज में हराकर भारत का पहला स्वर्ण दिलाया। मुकाबले के दौरान उनकी सटीक पंचिंग, शानदार रिंग क्राफ्ट और आत्मविश्वास साफ नजर आया। यह जीत पूरे भारतीय दल के लिए मनोबल बढ़ाने वाली साबित हुई और इसके बाद भारतीय मुक्केबाजों ने एक के बाद एक स्वर्ण जीतकर इतिहास रच दिया। 23 अक्टूबर 2003 को भिवानी में जन्मीं प्रीति के माता-पिता पूर्व खिलाड़ी रहे हैं। उन्होंने आठवीं कक्षा में मुक्केबाजी शुरू की। 2022 एशियाई खेलों में कांस्य, 2025 विश्व कप में स्वर्ण और अब राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण जीतकर उन्होंने खुद को भारतीय महिला मुक्केबाजी की सबसे बड़ी उम्मीदों में शामिल कर लिया है।
जैसमीन लम्बोरिया: विरासत को नई ऊंचाई देने वाली चैम्पियन
भिवानी की जैसमीन लम्बोरिया ऐसे परिवार से आती हैं, जहां मुक्केबाजी पीढ़ियों से चली आ रही है। उनके परिवार ने भारतीय बॉक्सिंग को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज दिए हैं। 2022 राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य जीतने के बाद उन्होंने विश्व चैम्पियन बनने का सपना पूरा किया और अब ग्लासगो में राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण भी अपने नाम कर लिया। महिलाओं के 57 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में उन्होंने उत्तरी आयरलैंड की माइकेला वॉल्श को 5-0 से हराया। पूरे मुकाबले में उनकी गति, तकनीक और आत्मविश्वास देखने लायक था। विश्व चैम्पियन बनने के बाद राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण जीतकर जैसमीन ने अपने करियर की एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की।
प्रिया घनघस: किसान परिवार की बेटी, जिसने संघर्ष को ताकत बनाया
झज्जर जिले की प्रिया घनघस का सफर संघर्ष, अनुशासन और आत्मविश्वास की मिसाल है। किसान परिवार से आने वाली प्रिया घनघस ने सीमित संसाधनों के बावजूद मुक्केबाजी में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। महिलाओं के 60 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में कनाडा की मैरी-बाथूल अल-अहमदिएह के खिलाफ पहले राउंड में वह दबाव में दिखीं, लेकिन दूसरे और तीसरे राउंड में शानदार वापसी करते हुए स्वर्ण पदक जीत लिया। मुकाबले के बाद उनका सहज बयान कि अब जलेबी और घेवर खाने को मिलेगा सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा में रहा।
साक्षी चौधरी : नई पीढ़ी की निडर मुक्केबाज
भारतीय महिला मुक्केबाजी को लम्बे समय से नए चेहरों की तलाश थी। साक्षी चौधरी ने ग्लासगो में वह कमी पूरी कर दी। सेमीफाइनल में कनाडा की एम्बर-जेन वॉल को हराने के बाद उन्होंने फाइनल में मेजबान इंग्लैंड की रूबी व्हाइट को भी कोई मौका नहीं दिया। घरेलू दर्शकों के भारी समर्थन के बावजूद साक्षी ने संयम और आक्रामकता का शानदार संतुलन दिखाया। सर्वसम्मत फैसले से मिली जीत ने उन्हें राष्ट्रमंडल चैम्पियन बना दिया और भारतीय महिला मुक्केबाजी की नई पीढ़ी का दम पूरी दुनिया के सामने ला दिया।
सचिन सिवाच: आखिरी राउंड में पलटा मुकाबला, जज्बे से जीता स्वर्ण
भिवानी के सचिन सिवाच भारतीय मुक्केबाजी की नई पीढ़ी के सबसे चमकदार सितारों में गिने जाते हैं। किसान परिवार से आने वाले सचिन ने बचपन में ही मुक्केबाजी शुरू की। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन कड़ी मेहनत और अनुशासित प्रशिक्षण ने उन्हें विश्व युवा चैंपियन बनाया। इसके बाद उन्होंने सीनियर स्तर पर भी लगातार सफलता हासिल की और भारतीय टीम के प्रमुख मुक्केबाजों में जगह बनाई।
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों के पुरुष 60 किलोग्राम वर्ग का फाइनल भारतीय अभियान के सबसे रोमांचक मुकाबलों में शामिल रहा। जिम्बाब्वे के ट्रायअगेन मॉर्निंग एनडेवेलो के खिलाफ शुरुआती दो राउंड में सचिन पिछड़ते नजर आए, लेकिन निर्णायक राउंड में उन्होंने शानदार वापसी की। तेज काउंटर पंच, बेहतरीन फुटवर्क और आक्रामक रणनीति के दम पर उन्होंने मुकाबले का रुख पलट दिया और 3-2 के विभाजित फैसले से स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। यह जीत केवल एक पदक नहीं थी, बल्कि दबाव में शानदार वापसी करने की उनकी क्षमता का भी प्रमाण बनी। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सचिन भारत के ओलंपिक अभियान की बड़ी उम्मीदों में शामिल होंगे।
अंकुश पंघाल: धैर्य और आत्मविश्वास से जीता स्वर्ण
हरियाणा के अंकुश पंघाल ने ग्लासगो में साबित कर दिया कि बड़े मुकाबलों में धैर्य सबसे बड़ा हथियार होता है। राष्ट्रीय स्तर पर लगातार अच्छे प्रदर्शन के बाद उन्होंने भारतीय टीम में जगह बनाई और पूरे टूर्नामेंट में शानदार मुक्केबाजी की। पुरुष 80 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में उनका सामना मेजबान इंग्लैंड के डिमेजी शिट्टू से था। पहले राउंड के बाद अंकुश पिछड़ गए थे, लेकिन उन्होंने अपनी रणनीति नहीं बदली। दूसरे और तीसरे राउंड में उन्होंने सटीक काउंटर पंच लगाए, शानदार डिफेंस किया और मुकाबले पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। अंततः उन्होंने स्वर्ण पदक जीतकर भारत के ऐतिहासिक अभियान को नई ऊंचाई दी।
हरियाणा से निकले छह चैम्पियन, राजस्थान ने भी बढ़ाया मान
भारतीय मुक्केबाजी के इस ऐतिहासिक अभियान में हरियाणा का दबदबा साफ दिखाई दिया। राज्य के मुक्केबाजों ने छह स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय टीम की सफलता में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। राजस्थान की अरुंधति चौधरी ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया और भारत के सातवें स्वर्ण की कहानी पूरी की। वहीं ओलम्पिक कांस्य पदक विजेता लवलीना बोरगोहाईं ने महिलाओं के 75 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता। मणिपुर के जदुमणि सिंह और राजस्थान के नरेंद्र बरवाल ने भी रजत पदक जीतकर भारतीय मुक्केबाजी के सर्वश्रेष्ठ अभियान में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
हरियाणा मॉडल क्यों बना देश के लिए मिसाल?
हरियाणा की सफलता किसी एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं, बल्कि मजबूत खेल व्यवस्था का परिणाम है। इस सफलता के पीछे कई कारण हैं। गांवों और स्कूल स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान। भिवानी, रोहतक, हिसार और झज्जर जैसे जिलों में मजबूत प्रशिक्षण व्यवस्था। अनुभवी प्रशिक्षकों का मार्गदर्शन। अंतरराष्ट्रीय पदक विजेताओं के लिए आकर्षक खेल नीति, नकद पुरस्कार और सरकारी नौकरियां। खेलों को सामाजिक सम्मान मिलने से युवाओं का बढ़ता रुझान। यही वजह है कि हर बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में हरियाणा के मुक्केबाज भारतीय टीम की रीढ़ बनकर उभरते हैं।
भिवानी: 'लिटिल क्यूबा' की पहचान फिर हुई मजबूत
भिवानी को भारतीय मुक्केबाजी का 'लिटिल क्यूबा' कहा जाता है। यह पहचान यूं ही नहीं मिली। इसी शहर ने देश को विजेंदर सिंह, अखिल कुमार, विकास कृष्ण, मनोज कुमार जैसे दिग्गज मुक्केबाज दिए। अब ग्लासगो में प्रीति पंवार, जैसमीन लम्बोरिया और सचिन सिवाच ने तीन स्वर्ण पदक जीतकर इस विरासत को और मजबूत किया। भिवानी की सफलता बताती है कि मजबूत प्रशिक्षण, खेल संस्कृति और निरंतर मेहनत किस तरह विश्वस्तरीय खिलाड़ी तैयार करती है।
लॉस एंजिलिस ओलम्पिक से बढ़ीं उम्मीदें
ग्लासगो की सफलता ने यह संकेत भी दिया है कि भारतीय मुक्केबाजी अब नई पीढ़ी के भरोसे बड़े लक्ष्य हासिल करने की स्थिति में पहुंच चुकी है। विश्व चैम्पियनशिप, एशियाई खेल और लॉस एंजिलिस ओलंपिक जैसे बड़े मंचों पर अब इन्हीं खिलाड़ियों से देश को बड़ी उम्मीदें रहेंगी। भारतीय मुक्केबाजी की सबसे मजबूत धड़कन आज भी हरियाणा में बसती है और यही नई पीढ़ी आने वाले वर्षों में भारत के ओलंपिक सपनों को नई उड़ान दे सकती है।
सीएम बोले: हरियाणा की खेल नीति का दिख रहा असर
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने राष्ट्रमंडल खेल 2026 में शानदार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को बधाई देते हुए कहा कि प्रदेश के खिलाड़ियों ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का सिर गर्व से ऊंचा किया है। उन्होंने कहा कि हरियाणा की खेल नीति, आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं और खिलाड़ियों की कड़ी मेहनत का ही परिणाम है कि राज्य के खिलाड़ी लगातार विश्व स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि हरियाणा के खिलाड़ी भविष्य में भी ऐसे ही शानदार प्रदर्शन करते हुए देश के लिए अधिक से अधिक पदक जीतेंगे और तिरंगे की शान बढ़ाएंगे। उन्होंने सभी पदक विजेता खिलाड़ियों, उनके परिवारों और प्रशिक्षकों को भी बधाई दी।
