हरियाणा के सगे भाई–बहन स्पेन में बरसाएंगे मुक्के

पूनम पूनिया और दीपक पूनिया पर होंगी सभी की नजरें

स्पेन में जब रिंग में उतरेगी रिश्तों और गांव की ताक़त

खेलपथ संवाद

नई दिल्ली। स्पेन में 2 से 8 फरवरी तक आयोजित हो रहा बॉक्सम एलीट इंटरनेशनल बॉक्सिंग टूर्नामेंट  सिर्फ़ एक अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज़ी प्रतियोगिता नहीं बल्कि यह भारत की उस जमीनी खेल संस्कृति की कहानी भी कहता है, जहाँ सपने परिवारों में पलते हैं और गाँवों से उड़ान भरते हैं।

यह भारत के लिए वर्ष 2026 की पहली अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज़ी प्रतियोगिता है। दुनिया के कई मज़बूत मुक्केबाज़ी राष्ट्रों के बीच भारतीय टीम पूरे आत्मविश्वास के साथ रिंग में उतरी है। लेकिन इस बार भारतीय चुनौती की सबसे ख़ास बात सिर्फ़ पदक या रैंकिंग नहीं, बल्कि मानवीय रिश्तों और ग्रामीण पृष्ठभूमि की मज़बूत मौजूदगी है। जब इस टूर्नामेंट में भारत की ओर से पूनम पूनिया और दीपक पूनिया सगे भाई–बहन के रूप में एक साथ अंतरराष्ट्रीय रिंग में उतर रहे हैं।

एक ही परिवार से दो खिलाड़ियों का एक ही टूर्नामेंट में देश का प्रतिनिधित्व करना सिर्फ़ संयोग नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, त्याग और पारिवारिक समर्थन का परिणाम है। जब बहन रिंग में उतरती है, तो भाई उसकी ताक़त बनता है। जब भाई मुकाबले में होता है, तो बहन का विश्वास उसकी ढाल बन जाता है। यह दृश्य बताता है कि भारतीय खेल सिर्फ़ व्यक्तिगत संघर्ष नहीं, बल्कि साझा सपनों की यात्रा है।

एक ही गाँव, दो मुक्केबाज़, एक पहचान

इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर हरियाणा के भिवानी ज़िले के गाँव मिताथल की भी विशेष मौजूदगी है। भारतीय पुरुष टीम के मुक्केबाज़ सचिन सिवाच जूनियर और जुगनू अहलावत दोनों गाँव मिताथल  से निकलकर आज स्पेन की रिंग में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। एक ही गाँव से दो खिलाड़ियों का बॉक्सम एलीट इंटरनेशनल बॉक्सिंग टूर्नामेंट जैसे प्रतिष्ठित मंच पर पहुँचना यह साबित करता है कि प्रतिभा बड़े शहरों की मोहताज नहीं होती। सही मार्गदर्शन, मेहनत और अनुशासन हो तो गाँव भी विश्व मंच तक पहुँचते हैं।

सिर्फ़ टूर्नामेंट नहीं, एक संदेश

बॉक्सम एलीट इंटरनेशनल बॉक्सिंग टूर्नामेंट  भारत के लिए सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय अनुभव नहीं है, बल्कि यह संदेश भी है कि परिवार अगर साथ हो, गाँव अगर विश्वास करे, और मेहनत अगर ईमानदार हो, तो भारतीय मुक्केबाज़ दुनिया के किसी भी कोने में रिंग में जीत सकते हैं। यह प्रतियोगिता शायद पदकों से आगे जाकर प्रेरणा की कहानी बन रही है। उन बच्चों के लिए, जो आज किसी गाँव की गली में मुक्के चलाना सीख रहे हैं और कल दुनिया के सामने भारत का तिरंगा उठाने का सपना देख रहे हैं।

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