कोचिंग में गढ़े प्रतिमान, कविताओं से दी हॉकी को पहचान

हॉकी के देश भारत की नायाब शख्सियत डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल

श्रीप्रकाश शुक्ला

ग्वालियर। हॉकी के देश भारत ने अनगिनत नायाब शख्सियतों को जन्म दिया है। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की अगुआई में जहां हमारे दिग्गज खिलाड़ियों ने देश को आठ ओलम्पिक और एक विश्व कप का स्वर्ण पदक दिलाया वहीं कई शख्सियतों ने हॉकी खेल के उत्थान को अपना सम्पूर्ण जीवन ही सौंप दिया। ऐसी ही विलक्षण शख्सियतों में चित्रकूट निवासी डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल भी शामिल हैं।

चित्रकूट के गांव छेछरिहा खुर्द के एक मध्यम वर्ग किसान के घर जन्मे डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल को बचपन से ही खेलों से लगाव रहा है। बड़े भाई रविशंकर शुक्ल चाहते थे कि उनका अनुज प्रेमशंकर अच्छे स्कूल में पढ़े इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्हें रीवा में तालीम दिलाई गई। अच्छे स्कूल में पढने की वजह से ही डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल  शिक्षा के साथ खेलों में भी प्रवीण बन सके।

डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल हायर सेकेंडरी परीक्षा पास करने के बाद एयर फोर्स के टेक्निकल कोर में भर्ती हुए। एयर फोर्स में जाने के बाद भी वह लगातार हॉकी खेलते रहे तथा उनके खेल में निखार आता गया। प्रेमशंकर शुक्ल के शानदार खेल को देखते हुए उनका चयन एयरफोर्स टीम में हो गया तथा उनकी पढ़ाई भी जारी रही। एमए, बीएड करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पीजी डिप्लोमा इन पर्सनल मैनेजमेंट (जर्मन भाषा में डिप्लोमा) में गोल्ड मेडल हासिल कर अपनी कुशाग्रबुद्धि का शानदार उदाहरण पेश किया। प्रेमशंकर शुक्ल की हॉकी में विलक्षण सेवाओं को देखते हुए विदेशी कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की।

एयरफोर्स में रहते हुए ही डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल का भारतीय खेल प्राधिकरण में सीनियर हॉकी कोच के पद पर चयन हुआ। वाराणसी हॉस्टल में बतौर प्रशिक्षक रहते हुए उन्होंने देश को कई अन्तरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी दिए, जिन्होंने अपने खेल-कौशल से मादरेवतन का मान बढ़ाया। एयरफोर्स में रहते हुए प्रेमशंकर शुक्ल ने कोलम्बो में अन्तरराष्ट्रीय लीवर कप क्लब टूर्नामेंट में देश का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने भारत की सीनियर एवं जूनियर टीम  के साथ बतौर पर्यवेक्षक मलेशिया का भी दौरा किया। इस दौरे में डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल को वहां के राजा अजलान शाह ने शाही डिनर के अवसर पर सभी टीमों के सामने मंच पर सम्मानित कर उनकी कर्मठता को सलाम किया।

डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल ने हॉकी की बतौर खिलाड़ी और प्रशिक्षक जहां तन-मन से सेवा की वहीं उन्होंने हॉकी पर लिखे अपने गीतों और पुस्तकों से इस खेल को एक नई गरिमा प्रदान की है। डॉ. शुक्ल के हॉकी गीत को दिल्ली में हुए विश्व कप में हॉकीप्रेमी दर्शकों को सुनाया गया था। इतना ही नहीं डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल को लंदन ओलम्पिक में उनके गीत के बोल के लिए लिरिक्स, म्यूजिक, कम्पोजीशन कैटगरी में ओलम्पिक मेडल भी प्रदान किया गया।

डॉ. शुक्ल की हॉकी कविताओं की हिन्दी और अंग्रेजी में लिखीं चार पुस्तकें आज हर हिन्दुस्तानी हॉकीप्रेमी की प्राणवायु हैं। डॉ. शुक्ल ने एक दर्जन से अधिक हॉकी गीत हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी एवं भोजपुरी भाषा में लिखे हैं। ये गीत दुनिया के कई देशों में भी हॉकी के अमर गीत बन चुके हैं। डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल ने वाराणसी में कोच रहते पांच वर्ष की अथक मेहनत के पश्चात एक नई हॉकी स्किल को ईजाद किया था। उन्होंने इस स्किल को ओलम्पिक खिलाड़ियों के खिलाफ खेलकर सही सिद्ध किया था। महान हॉकी खिलाड़ी मोहम्मद शाहिद ने अपने लेटर पैड पर लिखकर इस स्किल को प्रमाणित कर उसकी प्रशंसा की थी।

डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल लंदन के हॉकी राइटर्स क्लब के सदस्य हैं। इनका मेजर ध्यानचंद पर लिखा लेख मध्य प्रदेश शिक्षा विभाग की कक्षा पांच की पुस्तक सुगम भारती में छात्र-छात्राओं को पढ़ाया जाता है। इन्होंने चित्रकूट स्थित अंध विद्यालय की बालिका टीम को तीन महीने की मेहनत से पुश स्किल सिखाई, जोकि अपने आप बहुत बड़ी बात है। यह पुश स्किल इनके यूट्यूब चैनल (Dr PS Shukla Hockey) में दुनिया भर में देखी गई। इन्होंने राष्ट्रीय खेल-गान भी लिखा है, जिसे वह डीजी एसएआई, खेलमंत्री और पीएमओ को भेजने जा रहे हैं।

डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल भारतीय खेल प्राधिकरण के विशेषज्ञ प्रशिक्षक होने के साथ ही राष्ट्रीय हॉकी अम्पायर भी हैं। नेहरू हॉकी सोसायटी दिल्ली और अम्बेडकर हॉकी सोसायटी जालंधर इन्हें बेस्ट कोच का पुरस्कार दे चुकी हैं। डॉ. शुक्ल के हॉकी गीत देश के कई प्रमुख टूर्नामेंटों सुरजीत मेमोरियल हॉकी जालंधर, नेहरू हॉकी टूर्नामेंट दिल्ली, शास्त्री हॉकी टूर्नामेंट दिल्ली आदि में बजाए जाते रहे हैं। देश की कई हॉकी प्रतियोगिताओं में दर्शक इनके हिन्दी, पंजाबी, भोजपुरी भाषा में लिखे हॉकी गीतों का जमकर आनन्द लेते हैं। यह गर्व की बात है कि नेशनल स्टेडियम दिल्ली में हुई अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता में भी में इनका गीत अपनी छाप छोड़ने में सफल रहा।

हॉकी में इनके समर्पण का जीवंत उदाहरण गरीब बच्चों के लिए खोली गई इनकी तीन एकेडमियां हैं। झूंसी जिला प्रयागराज में खोली गई इनकी पहली एकेडमी है, जहां ओलम्पिक मेडल विजेता कोच पीयूष दुबे निकले। इस एकेडमी से हॉकी का ककहरा सीखने वाले कई लड़के सरकारी नौकरी पाकर अपना खुशहाल जीवन जी रहे हैं। डॉ. शुक्ल की दूसरी एकेडमी उनके गांव छेछरिहा खुर्द तथा तीसरी एकेडमी कर्वी चित्रकूट में है, जहां फिलवक्त 39 होनहार बालक-बालिकाएं उनसे हॉकी का कौशल सीख रहे हैं। उम्मीद है कि इन एकेडमियों के कुछ बच्चे हॉस्टलों के लिए चयनित होंगे तथा भविष्य में हॉकी का गौरव बढ़ाएंगे। डॉ. प्रेमशंकर शुक्ल फिलवक्त अपने चौथे पन में हैं लेकिन हॉकी का नाम सुनते ही वह फिर से जवां हो जाते हैं। भगवान इन्हें स्वस्थ और मस्त रखें ताकि भारतीय हॉकी की सांसें चलती रहें।

 

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