भारत में सम्मान-पुरस्कार दिए नहीं बांटे जाते हैं

देशभक्त सूबेदार सोमेश्वर दत्त सिंह का परिवार भारत रत्न, पद्म पुरस्कार से वंचित?

हेमंत चंद्र दुबे बबलू

नई दिल्ली। जिस परिवार का नाम खेलों की दुनिया में सबसे आदर और सम्मान से पुकारा जाता है, उस परिवार का  नाम है सूबेदार सोमेश्वर दत्त सिंह का जिनके परिवार के सदस्यों हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, कैप्टन रूप सिंह, अशोक कुमार, नेहा सिंह ने भारत के लिए ओलम्पिक, विश्व कप, एशियन गेम्स में तीनों रंगों के तेरह पदकों को जीतकर भारत मां को आभूषित किया, भारत का मान सारी दुनिया में बढ़ाया, भारत सरकार की दृष्टि आज तक इन्हें उनके हक के सम्मान से सम्मानित करने पर नहीं गई।

भारत रत्न के सच्चे और सर्वप्रथम इस देश में कोई खिलाड़ी यदि हकदार हैं तो वे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, जिन्हें दुनिया ने उनकी लगन, मेहनत और चमकते खेल कौशल को देखते ध्यान सिंह से ध्यानचंद की उपाधि से सम्बोधित कर दिया, लेकिन वाह री मेरी सरकारें उनके हिस्से का हक और सम्मान भारत रत्न देने में आज तक हाथ कांप रहे हैं, भारत रत्न देने के लिए हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का नाम आते ही हमारे देश के प्रधानमंत्री के दस लाख के पेन की स्याही सूख जाती है, जिससे वे मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की फाइल पर हस्ताक्षर कर सकते। गनीमत है कि 1956 में हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को पद्म भूषण से सम्मानित कर दिया गया, अन्यथा सम्मान न पाने वालों की सूची में वे आज भी रहते, जैसे भारत रत्न के सम्मान देने में उनके साथ व्यवहार किया जा रहा है।

कैप्टन रूप सिंह जिन्होंने अपने भाई हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के साथ मिलकर दुनिया की दो दो बड़ी ताकतों को ओलम्पिक खेलों में धूल चटाकर भारत के लिए दो ओलम्पिक स्वर्ण पदकों का गौरव दिलवाया, उनके हिस्से का पद्म सम्मान नहीं देने की जैसे सरकारों ने कसम खा ली हो। जिस रूप सिंह को दुनिया ने सम्मान दिया, उन्हीं के देश में उन्हें ठुकराया जाता रहा गया, जिस जर्मनी को ध्यान चंद-रूप सिंह ने जर्मनी में उसकी धरती पर धूल चटा दी, उसी जर्मनी ने 1972 म्यूनिख ओलम्पिक में रूप सिंह के नाम पर सड़क का नाम रखकर सम्मानित किया, वहीं 2012 लंदन ओलम्पिक में भारत के चार महान ह़की खिलाड़ी ध्यानचंद, उधम सिंह, क्लॉडियस के साथ यूट्यूब स्टेशनों के नाम पर रुप सिंह का नाम रखकर भारतीयों को गौरवान्वित किया लेकिन स्वतंत्र भारत की सरकारों को रूप सिंह के खेल की चमक का रूप आज तक दिखाई नहीं दिया।

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न नहीं देंगे, कैप्टन रूप सिंह और अशोक कुमार को पद्म सम्मान नहीं देंगे। जिनको दिया गया आलोचना नहीं, केवल विश्लेषण आकलन है  और वह अपना अपना आकलन हो सकता है। सम्मान देने में योग्यता, विद्वता, ईमानदारी, नैतिकता, सच्चाई का आखिर क्या आकलन किया जा रहा?

विडम्बना देखिए जो विश्व कप में बारहवें स्थान पर आए और उस विश्व कप में कुल बारह टीमों ने ही हिस्सा लिया उससे नीचे जाने की कोई उम्मीद नहीं थी, पद्म पुरस्कार के हकदार बना दिए गए, लेकिन वह खिलाड़ी जिसकी स्टिक से निकले गोल की वजह से भारत ने विश्व विजेता बनने का गौरव हासिल किया, वह खिलाड़ी इस देश में आज तक विश्व विजेता बनने के 50 स्वर्णिम वर्ष बीत जाने के बाद भी पद्म पुरस्कार पाने का हकदार नहीं बन  सका। यह वर्ष तो अशोक कुमार के विश्व विजयी गोल करने का स्वर्ण जयंती वर्ष था और कितना श्रेष्ठ होता कि  विश्व विजेता बनने के स्वर्णिम वर्ष में देश के प्रति दी गई उनकी सेवाओं के लिए वे सम्मानित किए जाते। लेकिन  लगता है आज पद्म पुरस्कार योग्यता देखकर नहीं दिए जाते बल्कि विचारधारा के आधार पर बांटे जा रहे हैं, और पूर्व की सरकारें यह सम्मान तुष्टिकरण के आधार पर बांटती चली आईं और ये विचारधारा की आड़ में बांटे जा रहे हैं। अब हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, कैप्टन रूप सिंह, अशोक कुमार न तो किसी राजनीतिक विचारधारा के पोषक रहे और न ही उनसे किसी वोट बैंक को प्रभावित किया जा सकता है इसलिए वे अन्याय के शिकार होते चले गए।

अशोक कुमार केवल हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के सुपुत्र नहीं बल्कि भारत के उन महान खिलाड़ियों में शुमार हैं जिन्होंने 1970 के दशक में हॉकी की दुनिया में अपने खेल कौशल से भारत का डंका चारों ओर बजाया, जिनके आक्रमण से सारी दुनिया के हॉकी मुल्क घबराते और खौफजदा रहते थे। पाकिस्तान और दुनिया के बेहतरीन सेंटर  हॉफ अख्तर रसूल ने एक मुलाकात में मुझसे स्वयं कहा था कि हम अशोक कुमार के खेल से खौफ खाते थे, और जिससे हम खौफ खाते थे उसकी स्टिक से हमारे खिलाफ 1975 विश्व कप में  भारत का विजयी गोल निकला, जिसकी आशंका थी वही हुआ। लेकिन वाह री मेरी स्वतंत्र भारत की सरकारें तुम्हारी नजरें इस बेहतरीन खिलाड़ी पर आज तक नहीं गईं।

1970 बैंकाक एशियन गेम्स में  रजत पदक, 1971 प्रथम विश्व कप में कांस्य पदक, 1972 म्यूनिख ओलम्पिक में कांस्य पदक, 1973 विश्व कप में रजत पदक, 1974 तेहरान एशियन गेम्स में रजत पदक, 1975 विश्व कप में स्वर्ण पदक, 1978 बैंकाक एशियन गेम्स में रजत पदक जीतकर भारत के लिए बहुमूल्य सेवाएं प्रदान कीं, किन्तु उनकी इस देश सेवा को सरकारों ने ऐसे भुला दिया जैसे मानो उन्होंने देश के लिए कुछ किया ही नहीं, लगता है देश की सेवा करना ही उनका अपराध हो गया। आश्चर्य और दुःख तो तब होता हैं कि जब बिना पदक विजेताओं  तक को पद्म पुरस्कार से हमारी  अंधी-बहरी सरकारों द्वारा सम्मानित कर दिया गया,आखिर ध्यानचंद, रूप सिंह, परिवार का क्या अपराध रहा। केवल  यह  कि वे निश्च्छल, निस्वार्थ भाव से देश की सेवा करते रहे?  

क्या केवल उनका यह अपराध रहा कि वे किसी राजनीतिक दल की विचारधारा से नहीं जुड़े? क्या उनका केवल यह   अपराध रहा कि वे अपने जीवन में सत्ता के गलियारों के चहेते नहीं रहे?  क्या केवल उनका यह अपराध रहा कि वे  देश के तिरंगे के लिए अपना सर्वस्व लुटाते रहे?  लगता है सरकारें पद्म सम्मान देती नहीं हैं, बांटती हैं। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न नहीं देंगे, कैप्टन रूप सिंह, अशोक कुमार जैसे महान खिलाड़ियों को पद्म सम्मान नहीं देंगे। ये कौन सी सरकारें हैं जो विचारधाराओं के आधार पर योग्यता का आकलन करती हैं, और पद्म सम्मान बांटती हैं।

जरा शर्म नहीं आई इस देश में गुटखा का, पान मसाला का, शराब की आड़ में सोडा का विज्ञापन करने वालों तक को पद्म सम्मान से सरकारें सम्मानित करती चली आ रही हैं। आओ जब चार यार बैठ का डायलॉग मारते हुए रॉयल स्टैग की शराब की आड़ में सोडा का विज्ञापन देने वालों तक को पद्म सम्मान से सम्मानित कर सरकार  अपने को गौरवान्वित समझ रही हैं, लोकतंत्र के मंदिर में सरकार बचाने के लिए संसद में जो रिश्वत ले ले वह इस देश में पद्म सम्मान का हकदार हो जाता है, लेकिन देश की खातिर हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद हिटलर जैसे तानाशाह के उच्च पद, उच्च वेतन के प्रलोभन को केवल देश के खातिर ठुकरा देते है, वह इस देश का भारत रत्न  का हकदार नहीं होते हैं  क्योंकि हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद से कोई सरकार बनना, बिगड़ना नहीं है, चुनावों में कोई वोट हासिल नहीं होना है, लेकिन जिसके पिताजी को पद्म सम्मान दिया गया उसके पुत्र के साथ भविष्य में  सत्ता के लिए राजनीतिक गठबंधन करना है।

आज सम्मान पाने के लिए यह मायने नहीं रखता कि आपने देशसेवा की है या नहीं बल्कि यह मायने रखता है कि आपने किस विचार धारा के संगठन की और उसके चलाने वालों की कितनी सेवा की है, मायने यह नहीं रखता कि आपने कार्य किया है या नहीं, आपने उसका प्रचार प्रसार किस तरीके से किया है, मायने यह रखता है कि जिस व्यक्ति को सम्मान दे रहे हैं उससे राजनीतिक कितने फायदे भविष्य में होंगे। आज लिखकर रख लीजिए कि इस वर्ष भारत रत्न पश्चिम बंगाल से दिया जायेगा एक नहीं दो नहीं तीन चार व्यक्तियों को एक साथ घोषित कर दिया जाएगा। भले ही आज सरकारी सम्मान से ऐसे महान खिलाड़ी, व्यक्तियों को कोसों दूर रखा गया है, लेकिन भारत के जनमानस के दिलों में वे गहराई से बसते हैं।

(श्री हेमंत चंद्र दुबे बबलू इस विषय पर निरंतर और लगातार विचारों की श्रृंखला लिखने को प्रतिबद्ध हैं)

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