निरंतर प्रवाहित धारा है भारतीय ज्ञान परम्पराः प्रो. गिरीश्वर मिश्र

भारतीय ज्ञान परम्परा: मूल और विकास विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

खेलपथ संवाद

भोपाल। रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल में मानविकी एवं उदार कला संकाय तथा संस्कृत प्राच्य भाषा एवं भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय ज्ञान परम्परा: मूल और विकास” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के शारदा सभागार में विद्वानों ने भारतीय बौद्धिक परम्परा की जड़ों और उसके निरंतर विकास पर अपने विचार रखे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे जी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. भरत शरण सिंह (अध्यक्ष, निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग, मध्यप्रदेश) उपस्थित रहे। इस अवसर पर विशिष्ट वक्ताओं के रूप में प्रो. गिरीश्वर मिश्र (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा), डॉ. मुकेश मिश्रा (निदेशक, दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान, भोपाल) और डॉ. सुप्रिया पाठक (सह आचार्य, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा) ने अपने विचार प्रस्तुत किए। राष्ट्रीय संगोष्ठी की समन्वयक डॉ. सावित्री सिंह परिहार, सह आचार्य इतिहास आरएनटीयू ने भारतीय ज्ञान परम्परा: मूल और विकास पर अपने विचार व्यक्त किए। संचालन का दायित्व डॉ. विशाखा राजुरकर राज ने निभाया।

कुलाधिपति संतोष चौबे ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का अंतिम लक्ष्य ब्रह्मज्ञान तक पहुँचना है। उन्होंने आचार्य ए.सी. मजूमदार की कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारी परंपरा सतत्व ज्ञान की साधना पर आधारित है। भारतीय दार्शनिक दृष्टि ने उन सत्यों तक पहुँचने का मार्ग दिखाया, जहाँ आधुनिक विज्ञान अब प्रयोगों द्वारा पहुँच रहा है।

प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा निरंतर प्रवाहित धारा है, जिसकी जड़ें वैदिक काल के पूर्व की सभ्यताओं में मिलती हैं। उन्होंने बताया कि श्रुति परम्परा ने वेदों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और व्यष्टि से समष्टि की ओर दृष्टि देना ही इस परम्परा का वास्तविक स्वरूप है। डॉ. भरत शरण सिंह ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति की आत्मा भारतीय ज्ञान परम्परा में निहित है। उन्होंने इस परम्परा को शिक्षा प्रणाली के पुनर्निर्माण का आधार बताते हुए कहा कि भविष्य का भारत इसी दृष्टि से आगे बढ़ेगा।

कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर अतिथियों का स्वागत करते हुए विश्वविद्यालय के कुलगुरु  प्रो. आर.पी. दुबे ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का मूल सापेक्षता एवं द्वैत का सिद्धांत है, जिसकी पुष्टि महान वैज्ञानिक आइंस्टीन ने अपनी यूनिफील्ड त्यौरी में की है। डॉ. मुकेश मिश्रा ने स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परम्परा न तो मात्र परम्परा  है और न ही केवल नॉलेज। उन्होंने कहा कि यह परम्परा शब्दों और वाचिक संस्कारों से जुड़ी है, किंतु वाचिक परम्परा के अध्ययन की उपेक्षा की गई है। इस दिशा में नए अकादमिक प्रयासों की आवश्यकता है।

डॉ. सुप्रिया पाठक ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को समझने के लिए लोक परम्परा और देशज ज्ञान को समझना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य से भी ज्ञान परम्परा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, ताकि इसकी व्यापकता और गहराई को समझा जा सके। इस अवसर पर विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित “कैम्पस मिमांसा” न्यूज़लेटर और आगामी “हिंदी ओलम्पियाड” के पोस्टर का विमोचन भी अतिथियों द्वारा किया गया। सत्र के अंत में कुलसचिव डॉ. संगीत जौहरी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने सभी अतिथियों, वक्ताओं, आयोजन समिति, सहयोगियों तथा प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विद्वानों के विचारों ने भारतीय ज्ञान परम्परा के मूल और विकास की नई दृष्टि प्रदान की है।

रिलेटेड पोस्ट्स