योगभूमि भारत में सम्मानित योग प्रशिक्षक भूखा

योग की महत्ता, धंधा और चोचलेबाजी में बेइंतिहा इजाफा  

श्रीप्रकाश शुक्ला

ग्वालियर। योग शरीर को मोड़ना-मरोड़ना या सांस रोककर रखना नहीं बल्कि यह एक ऐसी अवस्था में लाने की तकनीक है जहां आप वास्तविकता को उसके वास्तविक रूप में देखते और अनुभव करते हैं। यदि आप अपनी ऊर्जाओं को उल्लासमय और आनंदित होने देते हैं, तो आपका संवेदी शरीर विस्तृत होता है। यह आपको पूरे ब्रह्मांड को अपने एक अंश के रूप में अनुभव करने में सक्षम बनाता है, सब कुछ एक बना देता है, यही वह एकता है जो योग उत्पन्न करता है।

योग की खूबियों और उसकी महत्ता के प्रचार-प्रसार में पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने बहुत काम किए हैं। योग आज जनचेतना के साथ उभरते उद्योग का रूप ले रहा है। लेकिन इस विधा को जन-जन के मन में जगह देने की कोशिश में लगा सम्मानित योग प्रशिक्षक दो वक्त के भोजन को मोहताज है। देश में ही नहीं पाश्चात्य देशों में भी हमारे सम्मानित योग गुरुओं को कम पैसा मिलता है। दुखद तो यह कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वस्थ भारत के संकल्प को उन्हीं की पार्टी के लोग पलीता लगा रहे हैं। विश्व योग दिवस 21 जून को छोड़ दें तो योग गुरुओं की कोई सुध लेने वाला नहीं है।

हमारी हुकूमतें योग की महत्ता का बेसुरा राग तो अलापती हैं लेकिन योग प्रशिक्षकों के पेट पर लात मारने से भी बाज नहीं आतीं। काम दिया भी जाता है तो दाम के लिए सम्मानित योग प्रशिक्षकों को खून के आंसू रुलाया जाता है। बिहार में तो तीन योग प्रशिक्षकों ने पटना हाईकोर्ट में खराब सिस्टम के खिलाफ वाद भी दायर किया है। मध्य प्रदेश में भी सम्मानित योग प्रशिक्षकों को निजी कम्पनी के हाथों का खिलौना बनाया गया है। राजस्थान में तो योग प्रशिक्षकों को सिरे खारिज कर शारीरिक शिक्षकों को योग कक्षाएं चलाने की जवाबदेही सौंप दी गई है। उत्तर प्रदेश में पुरुष योग प्रशिक्षक को आठ हजार तो महिला योगगुरु को सिर्फ पांच हजार रुपये मिलते हैं। बिहार में योग की स्थिति काफी बदहाल है। यहां योग प्रशिक्षक को एक सत्र के सिर्फ 250 रुपये मिलते हैं। अब आप ही बताएं जब योग प्रशिक्षक भूखों मरेगा तो देश में कैसे योग की अलख जगेगी।  

योग के प्रणेता, पतंजलि ने कहा है, "स्थिरं सुखं आसनम्।" यानी जो आसन दृढ़ और सहज प्रतीत होता है, वही आपका आसन है। आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि आसन योग की क्रिया का एक प्रारम्भिक चरण मात्र है। यह एक ऐसा मार्ग है जो आपको महानतम प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है। योग आपके मन, शरीर और आत्मा के बीच सामंजस्य को आदर्श बनाने पर केंद्रित है। जब आप स्वयं को इस प्रकार समायोजित करते हैं कि आपके भीतर सब कुछ सुचारू रूप से कार्य करें, तो आप अपनी सर्वोत्तम क्षमताओं को उजागर कर पाएंगे।

फिलवक्त योगाभ्यास एक वैश्विक परिघटना बन गया है। दुनिया भर में लाखों लोग इसके शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभों को अपना रहे हैं। हालाँकि, इस फलते-फूलते उद्योग की तह में योग प्रशिक्षकों को दिए जाने वाले वेतन में एक आश्चर्यजनक असमानता छिपी है, पश्चिमी देशों के योग शिक्षक भारत के योग शिक्षकों की तुलना में काफ़ी ज़्यादा पैसा कमाते हैं। हाल के आंकड़ों के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका में योग शिक्षक प्रति घंटे 40-75 डॉलर के बीच शुल्क लेते हैं, जबकि नीदरलैंड, जर्मनी और फ्रांस में योग शिक्षक 33-67 डॉलर प्रति घंटे के बीच कमाते हैं। इसके विपरीत, भारत में, जहां इस प्रथा की उत्पत्ति हुई, योग शिक्षक प्रतिमाह 10 हजार रुपये से भी कम मानदेय पाता है। योग प्रशिक्षकों के वेतन में यह भारी अंतर वैश्वीकरण और प्राचीन भारतीय पारम्परिक ज्ञान के महत्व पर गम्भीर प्रश्न उठाता है।

वेतन में असमानता सिर्फ़ योग उद्योग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत में योग के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए यह विशेष रूप से चौंकाने वाली है। हालाँकि भारतीय योग शिक्षकों की योग्यता और अनुभव पश्चिमी समकक्षों के समान हो सकते हैं, लेकिन उन्हें वेतन बहुत कम मिलता है। इससे वैश्विक वेतन असमानता और भारतीय श्रमिकों के शोषण को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं।

वेतन अंतर का एक सम्भावित कारण पश्चिमी देशों और भारत के बीच जीवन-यापन की लागत में अंतर है। हालाँकि, यह वेतन में इस महत्वपूर्ण असमानता को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं करता है। एक अन्य कारण पश्चिमी देशों में योग कक्षाओं की बढ़ती माँग, पश्चिमी युवाओं द्वारा योग कक्षाओं के लिए अधिक भुगतान करने की इच्छा, और भारतीय योग शिक्षकों के वेतन की सुरक्षा के लिए सरकारी नियमों का अभाव हो सकता है।

प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति-माँग जैसी बाज़ार की ताकतें भी वेतन निर्धारण में भूमिका निभाती हैं। भारत में, योग शिक्षकों का बाज़ार अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है, जहाँ कई योग्य प्रशिक्षक सीमित पदों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे वेतन में कमी आ सकती है, क्योंकि स्टूडियो और जिम लागत कम रखने के लिए योग प्रशिक्षकों की अधिकता का फ़ायदा उठाते हैं।

हमारे सांस्कृतिक कारक भी वेतन अपेक्षाओं को प्रभावित करते हैं। भारत में, योग को अक्सर एक पेशे के बजाय एक आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में देखा जाता है, और कई योगगुरु अपने ज्ञान को साझा करने और अपने समुदाय की सेवा करने के एक तरीके के रूप में कम वेतन स्वीकार करने को तैयार हो सकते हैं। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय योग प्रशिक्षकों का शोषण किया जाना चाहिए या उन्हें कम आंका जाना चाहिए।

जैसे-जैसे वैश्विक योग उद्योग बढ़ता जा रहा है, वेतन में असमानता के कारण हमारे देश से प्रतिभा पलायन हो सकता है, और भारतीय योग प्रशिक्षक विदेशों में बेहतर वेतन वाले अवसरों की तलाश में जा सकते हैं। इससे पारम्परिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का ह्रास हो सकता है, क्योंकि भारतीय योग प्रशिक्षक अपने कौशल और विशेषज्ञता को दूसरे देशों में ले जा रहे हैं।

हाल के वर्षों में, भारतीय योग प्रशिक्षक अपनी सेवाओं को बढ़ावा देने और व्यापक दर्शकों तक पहुँचने के लिए तकनीक का लाभ उठा रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, ऑनलाइन मार्केटप्लेस और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग टूल ने उन्हें दुनिया भर के युवाओं से जुड़ने, कक्षाएं, कार्यशालाएँ और निजी सत्र आयोजित करने में सक्षम बनाया है। हालाँकि, अपने सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद, भारतीय योग प्रशिक्षकों को अक्सर कम वेतन स्वीकार करना पड़ता है।

यह वेतन असमानता सिर्फ़ योग उद्योग तक ही सीमित नहीं है। भारत के अतिथि कर्मचारी, जो एच-1बी वीज़ा पर अमेरिका जाते हैं, अक्सर ऐसी ही चुनौतियों का सामना करते हैं। इकोनॉमिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय एच-1बी वीज़ा धारकों को अक्सर अपने अमेरिकी समकक्षों की तुलना में कम वेतन मिलता है, यहाँ तक कि कुछ की कमाई 25 फीसदी तक कम होती है।

वैश्विक योग उद्योग, जिसके 2025 तक 44.4 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, कोई अपवाद नहीं है। जहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों में योग प्रशिक्षक 75 डॉलर प्रति घंटे से ज़्यादा कमा सकते हैं, वहीं उनके भारतीय समकक्षों को अक्सर काफ़ी कम वेतन स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह इस तथ्य के बावजूद है कि कई भारतीय योग प्रशिक्षकों ने व्यापक प्रशिक्षण प्राप्त किया है और इस अभ्यास की गहरी समझ रखते हैं, जिसकी शुरुआत उनके देश में 5,000 साल से भी पहले हुई थी।

भारत के योग प्रशिक्षकों को अपने पश्चिमी समकक्षों के बराबर वेतन पाने के लिए पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं है। ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल बाज़ारों के उदय के साथ, अब भारतीय योग प्रशिक्षकों के लिए वैश्विक दर्शकों तक पहुँचना और अपनी सेवाओं के लिए उचित वेतन प्राप्त करना सम्भव हो गया है। हालाँकि, इसके लिए योग और उसके महत्व के बारे में हमारी सोच में एक बुनियादी बदलाव की आवश्यकता है। हमें भारत में योग के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व और पारम्परिक ज्ञान एवं प्रथाओं के संरक्षण के महत्व को समझना होगा। हमें भारतीय योग प्रशिक्षकों के शोषण को भी स्वीकार करना होगा और वेतन असमानता को दूर करने के लिए कदम उठाने होंगे।

निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं को बढ़ावा देकर, प्रशिक्षण और संसाधन प्रदान करके, और भारतीय योग शिक्षकों के योगदान को महत्व देकर, हम एक अधिक समतापूर्ण और टिकाऊ वैश्विक योग उद्योग के निर्माण में योगदान दे सकते हैं। इससे न केवल भारतीय योग शिक्षकों को लाभ होगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित होगा कि योग के लाभ सभी को मिलें, चाहे उनका स्थान या राष्ट्रीयता कुछ भी हो। सच्चाई यह है कि यदि हमें अपने राष्ट्र को निरोगी रखना है तो सम्मानित योग प्रशिक्षकों को सम्मानजनक प्रोत्साहन राशि देनी होगी। उनके भविष्य को खुशहाल बनाना होगा।

मुजफ्फरपुर के योग प्रशिक्षकों ने खटखटाया अदालत का दरवाजा

बिहार में योग संचालन में बरती जा रही अंधेरगर्दी और खराब सिस्टम के खिलाफ जिला मुजफ्फरपुर के तीन योग प्रशिक्षकों साधना कुमारी, नंदनी कुमारी तथा अमलेश कुमार ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। दरअसल, बिहार में योग संचालन में जमकर खेल हो रहा है। स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय हैं तो भारतीय जनता पार्टी से हैं, लेकिन योग और योग प्रशिक्षकों के प्रति उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। कई बार योग प्रशिक्षक उनसे अपना दुखड़ा सुना चुके हैं लेकिन उनके कानों में जूं नहीं रेंगी।

मुजफ्फरपुर में तो कमाल ही हो गया। इस जिले में सिर्फ 11 महीने ही योग सत्र चलाए गए लेकिन योग प्रशिक्षकों के मानदेय का भुगतान अभी तक नहीं हुआ। अलबत्ता बजट नहीं है कहकर जिले के प्रत्येक हेल्थ एण्ड वेलनेस सेंटरों में योग सत्र बंद कर दिए गए। घर बैठे प्रशिक्षकों ने हर जवाबदेह पदाधिकारी को पत्र लिखा लेकिन समस्या का निदान नहीं हो सका। आखिरकार जिले की योग योग प्रशिक्षकों साधना कुमारी, नंदनी कुमारी तथा अमलेश कुमार ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खट-खटाकर समूचे शासकीय तंत्र को सकते में डाल दिया है। इन प्रशिक्षकों के अदालत जाने पर योग प्रशिक्षकों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं हैं लेकिन मेरा मानना है कि इन प्रशिक्षकों ने सही काम किया है। अदालत का दरवाजा खटखटाने वाली योग प्रशिक्षक साधना कुमारी का कहना है कि मैं चाहती हूं कि प्रत्येक योग प्रशिक्षक सम्मानजनक जीवन जिए तथा अन्याय के खिलाफ मुखर हो।    

 

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