आखिर कब तक भूखे पेट पढ़ाएंगे शिक्षा मित्र

इंसाफ मांगते थक गए लेकिन नहीं पसीजा सरकार का दिल

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सम्मानित शिक्षा मित्र पिछले 24 साल से समान काम, समान वेतन तथा सम्मानजनक मानदेय की मांग प्रदेश सरकार से कर रहे हैं। उम्मीद थी कि योगी सरकार में इन्हें इंसाफ मिलेगा लेकिन यहां शिक्षा मंत्री ही शिक्षा के अग्रदूतों का भला नहीं चाहते। अपना लगभग सम्पूर्ण जीवन शिक्षा को देने के बाद ये शिक्षा मित्र सोते-जगते अपने आपसे पूछते हैं कि उन्हें किस बात की सजा मिल रही है।

उत्तर प्रदेश में पिछले 25 वर्षों से एक लाख 13 हजार से अधिक प्राथमिक स्कूलों में पढ़ा रहे 1.50 लाख से अधिक शिक्षामित्र सहायक अध्यापक पद पर नियुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शिक्षामित्र योजना के तहत जनवरी-फरवरी 2001 से शिक्षामित्रों की नियुक्ति ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों में 2250 रुपये मानदेय पर की गई थी। तब न्यूनतम अर्हता इंटरमीडिएट रखी गई थी। प्राथमिक स्कूलों का भाग्य बदलने को यह योजना पूर्ण रूप से एक जुलाई, 2001 से शुरू हुई। स्कूलों में पढ़ाई शुरू करने से पहले शिक्षामित्रों को एक महीने का प्रशिक्षण दिया गया, जिसके लिए उन्हें उस एक महीने के लिए 400 रुपये मानदेय दिया गया था।

पिछली सरकार ने बगैर टीईटी शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक पद पर समायोजित करने का निर्णय लिया। समायोजन के पहले शिक्षा मित्रों का मानदेय तीन हजार पांच सौ रुपये था, जबकि शिक्षक बनने के बाद तकरीबन 28 हजार रुपये वेतन मिलने लगा। हालांकि इस मामले में सहायक शिक्षक कोर्ट चले गए और शिक्षा मित्रों की नियुक्ति को जायज नहीं ठहराया। जुलाई, 2017 में शिक्षा मित्रों का सुप्रीम कोर्ट से भी समायोजन निरस्त हो गया।

समायोजन निरस्त होने के बाद योगी सरकार ने अगस्त, 2017 में उनका मानदेय तीन हजार पांच सौ रुपये से बढ़ाकर 10 हजार रुपये कर दिया था, तभी से उसी मानदेय पर ये शिक्षा मित्र प्राथमिक स्कूलों में सेवाएं दे रहे हैं। सरकार ने कहा था कि भर्तियों में शिक्षामित्रों को प्रतिवर्ष ढाई नम्बर के हिसाब से अधिकतम 25 नम्बर तक का भरांक मिलेगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट से समायोजन निरस्त होने के बाद शिक्षामित्रों के हकों की सुध लेने की कौन कहे उन पर लाठी-डंडे बरसाए गए। सरकार यदि शिक्षा मित्रों को जरूरी समझती है तो, उन्हें सम्मानजनक मानदेय मिले तथा समायोजन की प्रक्रिया भी पूरी हो। सीधी सी बात है जिस प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा का अग्रदूत खुश नहीं होगा, उसका भगवान ही मालिक है।

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