मध्य प्रदेश की लीला न्यारी, द्रोणाचार्य अवॉर्डी है 27 हजारी

संविदा खेल प्रशिक्षकों को खून के आंसू रुला रहा खेल एवं युवा कल्याण विभाग

प्रशिक्षकों के वेतन में जमीन आसमान का अंतर, 10 हजार में कैसे हो गुजारा

खेलपथ संवाद

ग्वालियर। मध्य प्रदेश खेल एवं युवा कल्याण विभाग प्रदेश को खेलों में सिरमौर बनाने की झूठी ढींगे हांकता है। अरबों का खेल बजट होने के बाद भी 20 साल से संविदा पर काम कर रहे खेल प्रशिक्षक असमान वेतन को लेकर परेशान हैं। मलखम्ब के द्रोणाचार्य अवॉर्डी योगेश मालवीय के पास उपलब्धियां बेशुमार हैं लेकिन उन्हें सिर्फ 27 हजार रुपये मासिक मानदेय पर गुजारा करना पड़ रहा है जबकि विभिन्न एकेडमियों में तैनात प्रशिक्षकों को मोटी रकम देने के साथ ही उनकी दामादों सी आवभगत होती है।

मध्य प्रदेश खेल एवं युवा कल्याण विभाग जमीनी स्तर पर काम करने वाले प्रशिक्षकों के साथ दुश्मन सा व्यवहार कर रहा है। विधान सभा चुनाव से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संविदा प्रशिक्षकों की पंचायत कर उनके जीवन में खुशहाली लाने का भरोसा दिया था लेकिन उनके केन्द्र की सल्तनत पर काबिज होते ही प्रदेश सरकार ने वादे हैं वादों का क्या, वाली कहावत चरितार्थ कर दी। दूसरे प्रदेशों की सरकारें जहां 10 साल या उससे अधिक समय से संविदा या अंशकालिक स्तर पर काम करने वाले खेल प्रशिक्षकों के नियमितीकरण का सराहनीय काम कर रही हैं वहीं मध्य प्रदेश सरकार अपने संविदा प्रशिक्षकों को खून के आंसू रुला रही हैं।

दुःखद तो यह कि मध्य प्रदेश के संविदा खेल प्रशिक्षक लगभग 20 साल की सेवाएं देने के बाद भी समान काम, समान वेतन से दूर हैं। खेलों के विकास में प्रशिक्षकों का अहम योगदान होता है लेकिन मध्य प्रदेश खेल एवं युवा कल्याण विभाग द्वारा निरंतर खेल प्रशिक्षकों की उपेक्षा की जा रही है। खेल विभाग मध्य प्रदेश में वर्ष 2006 से संविदा पर प्रशिक्षण दे रहे क्वालीफाइड खेल प्रशिक्षक (एनआईएस डिप्लोमा) ग्रेड-1 को 20 वर्षों की सेवा के उपरांत भी मात्र 40 हजार 200 रुपए मासिक मानदेय दिया जा रहा है वहीं ग्रेड 2 खेल प्रशिक्षक को 35 हजार 400 रुपए मासिक मानदेय मिल रहा है।

इसके उलट खेल विभाग द्वारा संचालित राज्य खेल एकेडमियों में खेल प्रशिक्षकों को न्यूनतम₹ 60000 और अधिकतम ढाई लाख रुपए मासिक मानदेय दिया जा रहा है। खेल विभाग के संविदा खेल प्रशिक्षकों का कहना है कि खेल एवं युवा कल्याण विभाग में चपरासी, क्लर्क, जिला खेल अधिकारी आदि सभी पद नियमित रूप से भरे हुए हैं जबकि खेल विभाग की रीढ़ की हड्डी अर्थात खेल प्रशिक्षक पिछले 20 वर्षों से संविदा पर ही सेवाएं दे रहे हैं।

दुखद तो यह कि इन 20 वर्षों में खेल विभाग के आला अधिकारियों ने खेल प्रशिक्षकों के नियमित पद स्वीकृत करना भी जरूरी नहीं समझा। इतना ही नहीं पिछले 25 वर्षों में खेल प्रशिक्षकों के वेतन को भी रिवाइज नहीं किया गया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अल्प वेतन पर पिछले लम्बे समय से कार्य कर रहे क्वालीफाइड खेल प्रशिक्षक जोकि विभाग का मूल काम कर रहे हैं तथा मध्य प्रदेश के खिलाड़ियों को जमीनी स्तर से तैयार कर राज्य खेल एकेडमियों में भेजते हैं, उनकी तरफ विभाग ध्यान क्यों नहीं दे रहा।

यह संविदा खेल प्रशिक्षक ऊबड़-खाबड़ खेल मैदानों पर बिना उपकरण और बिना डायट के कठिन परिस्थितियों में काम करते हुए अच्छे खिलाड़ी तैयार कर रहे हैं परंतु खेल विभाग का पूरा फोकस केवल राज्य खेल एकेडमियों पर है। सच कहें तो  जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे अपने मूल कर्मचारियों का विभाग लगातार शोषण कर रहा है। हम आपको बता दें कि मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना हॉकी फीडर सेंटर जोकि मध्य प्रदेश के 35 जिलों में संचालित है, में तीन ऐसे एनआईएस डिप्लोमाधारी हॉकी प्रशिक्षक भी काम कर रहे हैं जिन्हें मासिक मानदेय के रूप में सिर्फ 10 हजार रुपये ही दिए जा रहे हैं। कोई खेलनहार तो बताए कि यह प्रशिक्षक 10 हजार रुपये में अपना जीवन-यापन कैसे कर रहे होंगे।

रिलेटेड पोस्ट्स