पद्मश्री ने हॉकी गोलकीपर सविता पूनिया के मिटाए सारे मलाल

दस साल तक रही बेरोजगार, खेलरत्न के लिए हुई बार-बार अनदेखी

खेलपथ संवाद

नई दिल्ली। भारतीय टीम में आने के बाद भी दस साल तक बेरोजगार रही, खेलरत्न के लिए बार-बार अनदेखी हुई लेकिन भारतीय हॉकी की दीवार कही जाने वाली सविता पूनिया ने हिम्मत नहीं हारी और अब पद्मश्री मिलने के बाद उन्हें खुशी है कि परिवार के बलिदान बेकार नहीं गए। तीन सौ से अधिक अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाली पहली महिला हॉकी गोलकीपर सविता ने कहा कि मेरे परिवार ने मेरा संघर्ष देखा है और मेरी सफलता भी देखी है तो उनकी ख्वाहिश थी कि मुझे सम्मान मिलते भी देखे। पद्मश्री के लिए चुने जाने पर अब मेरा पूरा सफर फ्लैशबैक में घूम रहा है कि कहां से शुरू किया और कहां उतार चढ़ाव आए।

उन्होंने बताया कि 2003 में सातवीं कक्षा में पढने के दौरान गांव के सरकारी स्कूल के शिक्षक के सुझाव पर पहली बार उनके पापा महेंद्र सिंह पूनिया सिरसा ट्रायल के लिए ले गए थे जहां उनका हॉकी में चयन हुआ। मेरी मम्मी को गठिया की बीमारी थी और वह पूरी तरह से बिस्तर पर थीं। मैं रसोई संभालती थी और नौकरी के साथ उनका पूरा काम पापा ही करते थे। ऐसे हालात में उन्होंने मुझे हॉकी खेलने के लिए भेजा। उस समय समझ नहीं आया लेकिन आज याद करती हूं तो उनके बलिदान समझ में आते हैं। वह भी ऐसे समय में जब लड़के और लड़कियों में इतना भेदभाव होता था।

सविता ने कहा कि मां की खराब हालत की वजह से मन हॉस्टल में नहीं लगा और हॉकी छोड़ने का मन बना लिया लेकिन तत्कालीन कोच सुंदर सिंह खरब ने उन्हें गोलकीपर बनाने का सुझाव दिया लेकिन कहा कि गोलकीपिंग किट की व्यवस्था करनी होगी क्योंकि उनके पास दो ही किट का बजट था जो वे दे चुके थे। उस समय मेरे पापा ने 18000 रुपए में गोलकीपिंग किट खरीदी जो उनकी दो महीने की तनख्वाह थी। मैं उस दिन बहुत रोई क्योंकि मुझे पता था कि उन पैसों की क्या कीमत थी। मैने उस दिन सोचा कि अब अपने माता-पिता के लिए भारतीय टीम में जगह बनाना है। मैं पापा को रिटर्न गिफ्ट देना चाहती थी।

इसके बाद सविता ने गोलकीपिंग ट्रेनिंग शुरू की और 2008 में पहली बार भारतीय टीम में चुनी गई जिसने उनके दादाजी को अलग तरह से प्रेरित किया। सविता ने बताया कि सिरसा से भारतीय टीम में आने वाली मैं पहली लड़की थी। अखबार में छपा था कि रणजीत सिंह पूनिया की पोती भारतीय टीम में चुनी गई। दादाजी पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन उन्होंने 67 साल की उम्र में मेरी दीदी की बेटी से पढ़ना सीखा ताकि वह खबर खुद पढ़ सकें। उनके इस जज्बे को देखकर उस दिन मैंने तय किया कि कभी किसी चुनौती से हार नहीं मानूंगी और दूसरी लड़कियों के लिए प्रेरणा बनूंगी कि अगर मैं कर सकती हूं तो हर लड़की कर सकती है।

चुनौतियां हालांकि टीम में आने भर तक नहीं थीं बल्कि अगले दस साल बेरोजगारी का दंश सविता ने झेला और लोगों के ताने परिवार ने सुने। सविता ने कहा कि मैं 2008 में टीम में आई और 2018 तक बेरोजगार थी। वाकई हालात बहुत खराब थे चूंकि खेल में चोट का डर रहता है, उपकरण महंगे आते हैं। मुझे आज भी याद है जब मैं टीम के साथ पहली बार विदेश जा रही थी तब हवाई अड्डे पर पापा ने 5000 रुपए दिए और भाई ने कोने में ले जाकर दो हजार रुपए दिए जो वह अपने दोस्त से उधार लाया था। वह मेरे लिए दो लाख रुपए से कम नहीं थे। फिर 2018 में अर्जुन पुरस्कार मिला तो मेरी मां का पहला सवाल था कि क्या अब नौकरी मिल जाएगी। रिश्तेदार पूछते थे कि इतने साल से भारतीय टीम में है और अभी तक नौकरी नहीं मिली तो खेलने का क्या फायदा लेकिन परिवार का साथ मेरी प्रेरणा बना और मैंने ठान लिया था कि कुछ बड़ा करना है।

इसके बाद 2011 में शिविर से घर लौटते हुए ऐसा वाकया हुआ जिससे उसने हॉकी छोड़ने का मन बना लिया था लेकिन फिर पिता संकटमोचक बने। सविता ने बताया कि मैं भोपाल से शिविर से लौट रही थी। दिल्ली से रोडवेज बस से घर जाते समय कंडक्टर ने किटबैग बस में रखने से इनकार कर दिया और कहा कि छत पर रखो। मैंने असमर्थता जताई तो कहने लगा कि एक आवाज दोगी तो दस लड़के खड़े हो जाएंगे। मैं स्तब्ध रह गई और पापा से कहा कि अब हॉकी नहीं खेलूंगी लेकिन पापा ने जैसे तैसे पैसों का जुगाड़ करके एक पुरानी गाड़ी खरीदी ताकि मैं किट लेकर आराम से आ जा सकूं। पद्मश्री से पहले सविता को खेलरत्न पुरस्कार मिलने की काफी उम्मीदें थीं लेकिन इतनी उपलब्धियों के बावजूद इस बार भी सूची में नाम नहीं आने से उनका दिल टूट गया था।

 

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