कोरोना के बहाने हजारों शारीरिक शिक्षक हुए बेगाने

...तो हमारा हिन्दुस्तान बीमार राष्ट्र कहलाएगा
श्रीप्रकाश शुक्ला
ग्वालियर।
हम सब स्वस्थ राष्ट्र की संकल्पना का झूठा राग अलापते हैं और खेलों को खेलभावना कहकर आडम्बर करते हैं। यदि यह सच नहीं तो हजारों शारीरिक शिक्षक कोरोना के बहाने क्यों बेगाने कर दिए गए। जबकि शारीरिक शिक्षक ही किसी राष्ट्र को खेलों की महाशक्ति बना सकते हैं।
नौकरी से निकाले गए शारीरिक शिक्षकों की पीड़ा से मैं आहत-मर्माहत हूं। अफसोस की बात है कि इन काबिल शारीरिक शिक्षकों की आवाज उठाने को कोई तैयार नहीं है। देश भर में बेरोजगार हो गए शारीरिक शिक्षकों का आंकड़ा हजारों नहीं लाखों में है। दुख की बात है कि इन शारीरिक शिक्षकों के आंसू पोछने का काम किसी सरकार या खेलनहारों ने नहीं किया है।
कोरोना संक्रमण और नौकरी की बात करें तो इससे सबसे अधिक शारीरिक शिक्षक प्रभावित हुए हैं। केन्द्रीय विद्यालयों में शारीरिक शिक्षकों को बेशक न निकाला गया हो पर उनसे इस नाजुक समय में बेगार कराई जा रही है।
देश में शिक्षा व्यवस्था पर गौर करें तो यह सरकार की बजाय निजी हाथों का खिलौना है। देश की 75 फीसदी शिक्षा व्यवस्था धन्नासेठों के हाथ है। खेल मंचों से इतर विभिन्न मंचों से यही धन्नासेठ स्वस्थ राष्ट्र का संकल्प दोहराते हैं लेकिन कोरोना संक्रमण की आड़ में शारीरिक शिक्षकों को घर बैठाने का इन्हीं लोगों ने अक्षम्य कार्य किया है। शासकीय स्कूल-कालेज हों या निजी, छात्र-छात्राओं से पूरे साल की फीस वसूली जा रही है जबकि शारीरिक शिक्षकों को घर बैठाकर उनके पेट पर लात मार देने पर किसी ने संकोच नहीं किया। 
खेलों से जुड़े लोगों से खेलपथ का विशेष आग्रह है कि बेरोजगार हुए शारीरिक शिक्षकों की पीड़ा को देखते हुए उनकी आवाज बुलंद की जाए वरना कोरोना तो आज नहीं तो कल विदा ले लेगा पर समूचा राष्ट्र हमेशा हमेशा के लिए बीमार हो जाएगा। शारीरिक शिक्षकों की अहमियत को नजरअंदाज करना राष्ट्रहित में नहीं है। आओ घर बैठे हजारों-लाखों शारीरिक शिक्षकों की पीड़ा और तंगहाली को अपना दर्द समझते हुए उनींदी सरकारों और धन्नासेठों को जगाएं ताकि दुनिया के सामने हिन्दुस्तान को बीमार राष्ट्र कहलाने से बचाया जा सके।

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