सारा सिस्टम धड़ाम, देश कैसे बने खेलों में महान

हमारे देश में अच्छे स्वास्थ्य को लेकर लोग जागरूक हो रहे हैं। यह जागरूकता रफ्तार पकड़े इसके लिए जरूरी है कि हमारी सोई हुकूमतें जागें और जमीनी स्तर पर काम करने वाले सम्मानित खेल और योग प्रशिक्षकों तथा शारीरिक शिक्षकों को उनका सम्मान और वाजिब भुगतान मिले। इन जमीनी योद्धाओं को पूर्णकालिक रोजगार मिले। इतना ही नहीं भारतीय खेल महासंघों की लचर व्यवस्था और खराब खेल सिस्टम में सुधार हो ताकि देश की खेल प्रतिभाओं के भविष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाया जा सके।

वैश्विक खेल आयोजनों में भारतीय खिलाड़ियों का संघर्ष यह साबित करता है कि हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, बल्कि उस प्रतिभा को निखारने वाले 'सिस्टम' में गम्भीर खामियां हैं। खराब खेल सिस्टम भारतीय खेलों की प्रगति में सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। खेल संघों पर राजनेताओं और नौकरशाहों का कब्जा, खिलाड़ियों के चयन में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार तथा बुनियादी खेल ढांचे की कमी देश के भविष्य का मुंह चिढ़ा रही है।

ग्रामीण स्तर पर जहां हर खेल की प्रतिभाएं हैं वहां खेल मैदान, कोच और उपकरणों का बेहद अभाव है। हमारे देश में खेलों के फंड का बड़ा हिस्सा कागजी कार्रवाई और अधिकारियों के दौरों पर ही खर्च हो जाता है। खेल संघों की कमान पूर्व खिलाड़ियों और स्पोर्ट्स मैनेजमेंट विशेषज्ञों को सौंपने की बजाय हम उन्हें मौका देते हैं जिन्हें खेल का ककहरा भी नहीं पता। गांवों से प्रतिभाओं को चुनने के लिए पारदर्शी प्रणाली बने, हर एथलीट को विश्वस्तरीय फिजियो, डाइटिशियन और मनोवैज्ञानिक मिलें तथा मेडल न आने या खराब प्रदर्शन पर केवल खिलाड़ियों को नहीं, बल्कि अधिकारियों को भी जिम्मेदार ठहराया जाए।

भारत को यदि एक खेल प्रधान देश बनना है, तो केवल 'खेलो इंडिया' जैसी योजनाओं के प्रचार से काम नहीं चलेगा। हमें अपने खेल सिस्टम की जड़ों को साफ करना होगा। जब तक खेल संघों से राजनीति और भ्रष्टाचार को बाहर नहीं निकाला जाएगा, तब तक देश के खिलाड़ी अपनी पूरी क्षमता से वैश्विक खेल मंचों पर तिरंगा नहीं लहरा पाएंगे। सिस्टम को खिलाड़ियों के लिए 'बाधक' नहीं, बल्कि उनका 'सहायक' बनना होगा।

140 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश का वैश्विक खेल मंचों पर गिने-चुने पदकों के लिए संघर्ष करना यह साबित करता है कि समस्या प्रतिभा की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जो इन प्रतिभाओं को निखारने के लिए जिम्मेदार है। भारत में खेल संस्कृति और प्रशासनिक ढांचे में सुधार की तत्काल आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी खेल मैदान और उपकरणों का भारी अभाव है। उपलब्ध बजट का बड़ा हिस्सा चुनिंदा महानगरों तक सीमित रह जाता है।

एथलीटों को आधुनिक डाइट, अंतरराष्ट्रीय कोच और खेल विज्ञान (स्पोर्ट्स साइंस) की सुविधाएं समय पर नहीं मिलतीं। चयन प्रक्रिया में पक्षपात और भाई-भतीजावाद के आरोप अक्सर खिलाड़ियों का मनोबल तोड़ते हैं। देखा जाए तो जो सुविधाएं खिलाड़ियों को प्रतिदिन मिलनी चाहिए वे सुविधाएं बड़े टूर्नामेंट से कुछ महीने पहले ही दी जाती हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर तैयारी सालों तक चलती है।

हमारे समाज से आज भी "पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब" की मानसिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यदि देश के खेल सिस्टम को सुधारा जाए तथा खेल संघों की कमान पूर्व एथलीटों और विशेषज्ञों के हाथों में सौंपी जाए तथा 'खेलो इंडिया' जैसे अभियानों को जिला एवं ब्लॉक स्तर पर अधिक पारदर्शी-प्रभावी बनाया जाए तो हमारे होनहार भी चमत्कार कर सकते हैं।

भारत में खेलों के विकास के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा मिले ताकि खिलाड़ियों को दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा मिल सके। भारत में खेल सिस्टम की विफलता केवल पदक तालिका में पीछे रहने तक सीमित नहीं है, यह देश की युवा ऊर्जा के सही उपयोग न होने का प्रतीक है। यदि भारत को एक वैश्विक खेल महाशक्ति बनना है, तो हमें तदर्थ व्यवस्था और अंतिम समय की तैयारियों से ऊपर उठकर एक दीर्घकालिक, पारदर्शी और खिलाड़ी-केन्द्रित इकोसिस्टम का निर्माण करना होगा। बदलाव की शुरुआत प्रशासनिक सुधारों और खेल के प्रति सामाजिक सोच को बदलने से ही होगी।

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