पंजाब की भावी पीढ़ी पढ़ेगी नशा न करने का पाठ
शिक्षा विभाग की 12 जिलों में नशा विरोधी अभिनव पहल
खेलपथ संवाद
चंडीगढ़। यह एक हकीकत है कि बच्चों को जितना अभिभावक और शिक्षक समझ सकते हैं, उतना दूसरा कोई नहीं। वे बच्चों के असामान्य व्यवहार की निगरानी करके उन्हें बुरी आदतों से बचा सकते हैं। शायद यही सोचकर पंजाब सरकार ने राज्य के 12 जिलों में 21,850 स्कूल टीचरों को छात्रों को नशीली दवाओं की लत से दूर रखने के लिये प्रशिक्षण देने का फैसला लिया है। ये शिक्षक प्रशिक्षण के बाद छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं और भावनात्मक परेशानी के शुरुआती लक्षणों की पहचान कर सकेंगे।
निश्चय ही यह एक स्वागतयोग्य पहल है। यह इसलिए भी जरूरी है कि बच्चों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से उन्हें नशे की गिरफ्त में आने से पहले ही बचाया जा सकेगा। यह बेहतर स्थिति है कि नशे की लत का शिकार होने के बाद उपचार के बजाय उन्हें पहले ही नशे से दूर रहने को प्रेरित किया जाए। दरअसल, पंजाब सरकार के ‘युद्ध नशियां विरुद्ध’ अभियान के तरह शुरू किया गया यह कार्यक्रम प्रिंसिपल और हेडमास्टरों की पिछली ट्रेनिंग तथा अमृतसर में 2,800 से ज्यादा टीचरों को शामिल करने वाले एक पायलट प्रोजेक्ट का हिस्सा है।
दरअसल, इस अभियान की सबसे बड़ी खूबी है कि यह नशा-विरोधी अभियान का फोकस नशे की लत लगने के बाद प्रतिक्रिया देने से हटाकर, उसे रोकने की ओर ले जाता है। निस्संदेह, शिक्षक एक अभिभावक जैसी भूमिका में होते हैं, जो बच्चे के व्यवहार, स्कूल में उपस्थिति, पढ़ाई-लिखाई के प्रदर्शन, दोस्ती या भावनात्मक स्थिति में बदलाव को बेहतर ढंग से महसूस कर सकते हैं। दरअसल, शिक्षक कक्षा में छात्र की चुप्पी और क्लास में होते हुए भी वहां न होने जैसे संवेदनशील बदलावों को भांप सकते हैं। लेकिन बच्चों की संवेदनशीलता को देखते हुए शिक्षकों को अनाड़ी जांचकर्ता या काउंसलर बनने से बचना होगा।
निर्विवाद रूप से किसी बच्चे का क्लास में चुप-चुप रहना, नम्बर कम आना या व्यवहार में बदलाव आना हमेशा नशे से जुड़े कारण से नहीं हो सकता। उससे जुड़े अन्य कारकों पर भी विचार किया जाना जरूरी होता है। दरअसल, इस जटिल समस्या के समाधान के लिये शिक्षकों को संवेदनशील व्यवहार के लिये प्रेरित किया जाना चाहिए। शिक्षकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के देखने, सुनने, बातचीत करने तथा छात्रों को योग्य पेशेवरों के पास भेजने के लिये प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
वास्तव में इस संवेदनशील समस्या का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कि किसी बच्चे में नशे की ओर उन्मुख होने और उसकी जल्दी पहचान होने पर उसे जल्दी मदद मिल सके। पर ऐसा न हो कि शिक्षक उत्साह में उसकी पहचान उजागर कर दें और उसकी जल्दी बदनामी हो जाए। ऐसा बच्चा कुंठा व हताशा में गलत राह में भटक सकता है। ऐसे में इस अभियान का मानसिक स्वास्थ्य वाला हिस्सा विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।
यह एक हकीकत है कि युवाओं में नशीले पदार्थों के गलत इस्तेमाल की समस्या को सिर्फ चेतावनी तथा नैतिक उपदेश देकर दूर नहीं किया जा सकता है। वास्तव में भावनात्मक परेशानी, पारिवारिक समस्याएं, दोस्तों का दबाव, अकेलापन और पढ़ाई का तनाव आदि सभी चीजें बच्चों को जोखिम में डाल सकती हैं। इसलिए स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम के साथ ही काउंसलिंग और रेफरल की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर सरकार को भी सिर्फ प्रशिक्षित किए गए शिक्षकों की संख्या के आधार पर सफलता को नहीं मापना चाहिए।
दरअसल, उसे यह भी देखना चाहिए कि कितने कमजोर या जोखिम वाले छात्रों की पहचान की गई है। साथ ही उन्हें कहां भेजा गया है। क्या उनकी काउंसलिंग की गई है? क्या बाद में उनका फॉलो-अप किया गया है? यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि शिक्षकों पर पढ़ाई के अलावा कई तरह के सरकारी कार्यक्रमों के लिये समय देने का दबाव होता है। ऐसे में सावधानी रखनी बेहद जरूरी है कि तमाम प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच ड्रग्स के खिलाफ प्रशिक्षण सिर्फ खानापूर्ति के लिये कागजी कार्रवाई बनकर न रह जाए। सबसे महत्वपूर्ण यह कि इस कार्यक्रम को क्लासरूम से आगे लेकर जाना चाहिए। जिसमें माता-पिता, काउंसलर, हेल्थ प्रोफेशनल और सामाजिक समूहों को एकजुट होकर जोखिम वाले बच्चों के लिये एक सपोर्ट नेटवर्क तैयार करना चाहिए।
