तीरंदाज शीतल देवी ने संशोधित खेलो इंडिया योजना की सराहना की

पैरालम्पिक पदक विजेता ने कहा- पैरा खेलों में ला सकती है बड़ा बदलाव

खेलपथ संवाद

नई दिल्ली। पैरालम्पिक पदक विजेता और विश्व चैम्पियन पैरा-कंपाउंड तीरंदाज शीतल देवी ने संशोधित खेलो इंडिया योजना (केआईएस) की सराहना करते हुए कहा है कि यह भारत में पैरा खेलों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। उन्होंने कहा कि योजना के जरिए दिव्यांग बच्चों की प्रतिभा को कम उम्र में पहचानकर उन्हें जरूरी प्रशिक्षण और सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ के एक दूरदराज गांव से निकलकर विश्व स्तर पर पहचान बनाने वाली 18 वर्षीय शीतल ने कहा कि प्रतिभा की कमी के बजाय अवसरों की कमी अक्सर पैरा खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है। शीतल ने अपने सफर को याद करते हुए कहा कि आज उन्हें जो पहचान और सम्मान मिल रहा है, उसके पीछे वर्षों की मेहनत के साथ अच्छे कोच और सहयोग भी रहे हैं। उन्होंने कहा कि किश्तवाड़ में रहते हुए वह खुद भी एक ऐसी बच्ची थीं, जिसकी प्रतिभा दुनिया से अनजान थी।

शीतल देवी ने कहा, मेरी कहानी सफलता की है, लेकिन किसी दूरदराज गांव में मेरे जैसी क्षमता रखने वाला बच्चा शायद यह भी नहीं जानता हो कि पैरा खेल होते हैं। हमारे बीच अंतर अक्सर अवसर का होता है।' शीतल ने कहा कि उन्हें कोच, भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) और सरकार सहित कई स्तरों से सहयोग मिला, जिसने उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करने का आत्मविश्वास दिया। हालांकि, उन्होंने कहा कि उनकी कहानी अपवाद नहीं होनी चाहिए।

पांच साल में 29,054 करोड़ रुपये का प्रावधान

शीतल ने केंद्र सरकार की संशोधित खेलो इंडिया योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत पांच साल के लिए 29,054 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। योजना में प्रतिभा की खोज, कोच और सपोर्ट स्टाफ का विकास, बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और हाई-परफॉर्मेंस ट्रेनिंग वातावरण तैयार करना जैसे प्रमुख पहलू शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इस योजना को सफल बनाने में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सक्रिय भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण होगी। उनके मुताबिक, केंद्र की योजनाओं को जमीनी स्तर पर वास्तविक नतीजों में बदलने के लिए राज्यों को पूरी तरह इसमें शामिल होना होगा।

घर के पास सुविधाएं मिलने से बढ़ेगा भरोसा

शीतल ने पैरा खेलों के लिए अकादमियों और प्रशिक्षण केंद्रों को खिलाड़ियों के घर के करीब विकसित करने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि दिव्यांग बच्चों के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर कोच या प्रशिक्षण केंद्र तलाशना आसान नहीं होता। उन्होंने कहा, 'कई प्रतिभाशाली बच्चे गांवों में इसलिए रह जाते हैं क्योंकि सुविधाएं उनके आसपास नहीं होतीं। अगर बच्चों के रहने की जगह के पास गुणवत्तापूर्ण पैरा खेल अकादमियां और प्रशिक्षित कोच उपलब्ध हों, तो परिवार भी उन्हें खेलों में भेजने के लिए अधिक आश्वस्त महसूस करेंगे।'

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