एआई के विकास में मानवीय गरिमा को प्राथमिकता जरूरी

प्राइवेसी, रोजगार, असमानता और मानवीय मूल्यों से जुड़े खतरे भी

अश्विनी कुमार

मानवता के लिए एआई के करिश्माई फायदे सामने आ रहे हैं। यह तकनीक स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास में क्रांतिकारी बदलाव लाने में सक्षम है लेकिन इससे प्राइवेसी, रोजगार, असमानता और मानवीय मूल्यों से जुड़े खतरे भी हैं। विशेषज्ञों व नीति नियंताओं का दायित्व है कि एआई के उपयोग में मानवीय गरिमा तथा प्रभावी वैश्विक नियमन को प्राथमिकता मिले।

मानवता की सेवा में विज्ञान और नवाचार की असीम सम्भावनाओं का उपयोग करते हुए, मानव इतिहास के सबसे अहम दौर में, एआई क्रांति एक परिवर्तनकारी क्षण के रूप में दिखाई देती है। प्रत्येक क्षेत्र में अभूतपूर्व चुनौतियों से निबटने में सशक्त बनाने वाली इसकी क्षमता उपलब्धियों पर गर्व करने को जायज ठहराती है, वह उपलब्धि जिससे देवता तक इर्ष्या करें, जो मानवता की संयुक्त आविष्कारक क्षमता का सम्मान है। दोहराव वाले ऊबाऊ कार्यों का स्वचालन कर फुर्सत के लिए समय उपलब्ध कराना, जरूरी सेवाओं तक पहुंच बढ़ाना, चिकित्सा में नई खोजें, दीर्घायु बनाना और बेहतर स्वास्थ्य सेवा यकीनी बनाना, जिसमें कैंसर जांच और घातक बीमारियों का पूर्वानुमान भी शामिल है, रोगियों की रोबोटिक देखभाल, वंचित वर्गों को मदद का अधिक प्रभावी और लक्षित वितरण, सभी के लिए शिक्षा और ज्ञान तथा आपदा प्रबंधन व मौसम पूर्वानुमान सहित अनेक तरीकों से पर्यावरण सततता बनाने में व्यापक योगदान, ये सभी अधिक समावेशी विकास उद्देश्य की दिशा में एआई के कुछ सबसे अहम योगदान हैं।

फिर भी, मानव समाज के भविष्य और ‘बुद्धिमत्ता की नियति’ से जुड़े प्रश्नों पर दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, नेताओं और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों के बीच बहस जारी है। इनमें से कुछ उस एआई के भावी विकास व क्रियान्वयन पर विराम लगाने की अपील करते हैं, जो हमारी मानवता की अवधारणा को ही अपहृत कर सकती हो। वहीं एआई समर्थकों के दावे हैं कि इसकी मदद से वस्तुओं एवं सेवाओं की ‘अद्भुत प्रचुरता’ बनेगी और चेतावनी देते हैं कि नियमन से वैज्ञानिक प्रगति धीमा करने से उन अहम प्रश्नों का सामना करना पड़ेगा जो मानवीय संवेदनाओं और सहस्राब्दियों तक चली सांस्कृतिक विकास-यात्रा के जरिये हमारे अस्तित्व की गहराइयों में समाहित भावनाओं के आधार पर नैतिक सुरक्षा-सीमाओं की आवश्यकता रेखांकित करते हैं।

हम कौन हैं, और क्या हम मानवता के ऐसे नए नैरेटिव के लिए तैयार हैं जिसमें कार्यात्मक दक्षता और वादे मुताबिक भौतिक समृद्धि, मानवीय आकांक्षाओं व भावनाओं की गरिमा पर हावी हो जाए, यह एक अपरिहार्य प्रश्न है, जिसने तकनीकी चमत्कारों के आकर्षण में बहने को रोके रखा है। यह इसलिए अहम है कि एआई तकनीक मानवीय भावनाओं और अंतर्ज्ञान को समझने सहित संज्ञानात्मक कौशलों की नकल कर सकती है, व कई बार बेहतर प्रदर्शन भी कर सकती है। क्या हम अनंत तकनीकी उथल-पुथल और रोजगार बाज़ार में दीर्घकालिक अस्थिरता से पैदा ‘तनाव की वैश्विक महामारी’ के लिए तैयार हैं, साथ ही ‘बेकार’ हुए करोड़ों लोगों की अनुमानित भीड़ के लिए, जिसे तकनीकी परिवर्तन के प्रभावों से तालमेल बैठाने में असहनीय तनाव झेलना पड़ेगा? क्या हमारे पास ऐसे सामाजिक-आर्थिक मॉडल हैं जो व्यक्ति का आत्मसम्मान बचा पाएं और सबके लिए अपनत्व व भावनात्मक कल्याण से पूर्ण जीवन यकीनी बनाएं? ये दार्शनिक प्रश्न इंसानी नजरिये से पैदा होते हैं, जिसकी नींव मानवीय मूल्यों पर टिकी है। इस पर गंभीर चिंतन जरूरी है कि ‘मन के उस गुप्त क्षेत्र को कैसे सुरक्षित रखा जाए, जहां से भावनाएं जन्मती हैं, प्रेरणा बहती है, व इच्छाएं स्पंदित होती हैं- मानवीय आत्मा का वह आत्मपरक पक्ष जो हम सब को अनिवार्यत: वह बनाता है, जो हम हैं’।

डेटा गोपनीयता की कमजोरियां, दुष्प्रचार का प्रसार, चुनावी हेराफेरी, सुपर इंटेलिजेंट हथियार प्रणालियों के नियंत्रण से बाहर हो जाने की संभावना, एआई-सक्षम फ़िशिंग मुहिम तथा निगरानी एवं सेंसरशिप- ये कुछ भयावह संकेत हैं जो किसी प्रभावी वैश्विक नियामक के अभाव में सामाजिक उथल-पुथल की वजह बन सकते हैं। राष्ट्र और राज्यों की डिजिटल संप्रभुता बनाए रखना चुनौती है, क्योंकि डेटा पर नियंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा और देशों की रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ा है।

इसलिए, एआई की वह दुनिया, जो मानवता का भविष्य बदलने में सक्षम है, उसे ऐसी नैतिक दृष्टि चाहिये जो तकनीकी प्रगति का तालमेल अच्छे और खुशहाल समाज की जरूरतों से बिठा सके। अति आत्मविश्वास बोध को टेरी ईगलटन ने ऐसे व्यक्त कियाः ‘अति आत्म-विश्वास अंततः विनाशकारी होता है, जिसने प्राचीन यूनानियों को भय के चलते आकाश की ओर देखने पर विवश कर दिया था’। स्पेनी दार्शनिक जोसे ओर्तेगा वाई गासेट याद दिलाते हैं ‘हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जब मनुष्य स्वयं को बेहद सक्षम मानता है, परंतु उसे नहीं पता कि क्या सृजित करे। वह सबका स्वामी है, किंतु खुद का नहीं। पहले से अधिक साधन, ज्ञान और तकनीक होने के बावजूद, आज की दुनिया भी उसी दिशा में जा रही जिस दिशा में अब तक की सबसे बुरी दुनिया गई थी’।

‘एआई के युग में मानव की व्यक्तिगत रक्षा’ शीर्षक से पोप लियो चौदहवें का धर्मादेश-पत्र एआई से जुड़े मानवतावादी द्वंद्वों पर नैतिक बहस को व्यक्त करता है। यह स्वीकार करते हुए कि प्रौद्योगिकी मानवता की विरोधी नहीं, पोप ने बल दिया है कि एआई के इस युग में, जब मानव गरिमा अमानवीकरण के नए रूपों से संकटग्रस्त है, तब हम ‘गहराई से मानवीय’ बने रहें। व्यक्ति की गरिमा के आधार पर नैतिक विवेक के मानदंड स्थापित करने की जरूरत बताते हुए, सम्माननीय पोप ने ‘केवल अपनी चलवाने’ वाला भ्रम बनाने के विरुद्ध चेताया और ऐसी प्रगति के प्रति सावधान किया जो असमानता बढ़ाती हो तथा लोगों के दुख न हर सके।

उन्होंने ‘लाभ की पूजा, जो कमजोरों की बलि लेती हो; ऐसी एकरूपता, जो भिन्नता को निष्प्रभावी करे; और यह दिखावा कि एक ही भाषा, डिजिटल भी, में सबकुछ अनुवादित किया जा सके, इसमें व्यक्ति के रहस्य को आंकड़ों में बदलना शामिल है’, उसे नामंजूर करने का आह्वान किया है। पूज्य पोप के ये बयान ऐसी दुनिया के लिए नैतिक निर्देश हैं, जिसे अपनी रचनाओं से परे 'इंसानियत की शान और भव्यता' और एआई की 'भावनात्मक, रिश्तों या आध्यात्मिक क्षमताओं' से जुड़ी सीमाएं याद दिलाना ज़रूरी है। पोप द्वारा व्यक्त नैतिक नियम बताता है कि इंसानियत, इंसान की 'नाज़ुकता व नफासत' सीमाओं में ही फलती-फूलती है।

इस प्रकार, इंसानी गरिमा पर आधारित केंद्रीय मानवीय मूल्यों के नज़रिए से देखें तो, दुनिया भर के नेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे एआई के इस्तेमाल और नियमन में 'इंसान को केंद्र में रखने वाला' ढंग अपनाएंगे ताकि मानवता का भला हो और उनके फैसलों के केंद्र में व्यक्ति हो। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में पेरिस में हुए विवाटेक सम्मेलन (17-20 जून, 2026) और उससे पूर्व फरवरी 2026 में नई दिल्ली में ग्लोबल इंडिया एआई समिट में ऐसे ही ढंग पर ज़ोर दिया था। इसके लिए एआई का उपयोग नियंत्रित करने को स्वैच्छिक और अबाध्यकारी शर्तों के बजाय मज़बूत व लागू करने योग्य नियमन व्यवस्था की ज़रूरत होगी, जो अत्याधुनिक एआई तक हरेक की पहुंच आसान बनाता हो और जिस दौर में ' सब कुछ एक जैसा करके देखा व किसी चीज़ का सम्मान न रखा' जाता हो-वहां एक साझा और भरोसेमंद एआई पारिस्थितिकी सुनिश्चित की जाए। राष्ट्र इस ऐतिहासिक चुनौती से कैसे निपटेंगे, यह बात नेतृत्व की गुणवत्ता व समानता एवं मानवीय गरिमा पर आधारित समावेशी लोकतंत्र के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को परिभाषित करेगी, जो हमारी सभ्यता की परम चाहत है।

(लेखक पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री हैं)

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