गुरुकुल परम्परा के अनुरूप शिक्षा दर्शन पर विद्वानों ने साझा किए अनुभव

रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय योग सेमिनार आयोजित

खेलपथ संवाद

भोपाल। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल के योग विभाग द्वारा “भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद” के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय योग सेमिनार में ‘गुरुकुल परम्परा के अनुरूप शिक्षा दर्शन’ पर देशभर के विद्वानों और शोधार्थियों ने अपने अनुभव साझा किए।

अंतरराष्ट्रीय योग सेमिनार में मुख्य अतिथि आयुष मंत्रालय, भारत सरकार से डॉ. रामनारायण मिश्रा (रिसर्च ऑफिसर), लखनऊ विश्वविद्यालय से डॉ. अमरजीत यादव (प्रोफेसर), श्री रामसंस्कृत महाविद्यालय, चित्रकूट (सतना) से डॉ. तुषारकांत शास्त्री (एसोसिएट प्रोफेसर) तथा रावतपुरा सरकार विश्वविद्यालय से डॉ. केवलराम चक्रधारी (एसोसिएट प्रोफेसर) आदि ने योग की महत्ता पर अपने विचार व्यक्त किए।

उद्घाटन सत्र में डॉ. रामनारायण मिश्रा ने अपने उद्बोधन में कहा कि प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था केवल औपचारिक शिक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह समग्र जीवन निर्माण की प्रक्रिया थी। उन्होंने बताया कि गुरु–शिष्य परम्परा के माध्यम से संस्कार, अनुशासन, आत्मबोध एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास किया जाता था। साथ ही उन्होंने वर्तमान शिक्षा प्रणाली में योग एवं भारतीय ज्ञान परम्परा को समाहित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. अमरजीत यादव ने योग एवं शिक्षा के अंतर्संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि योग के माध्यम से विद्यार्थियों में एकाग्रता, स्मरण शक्ति एवं चारित्रिक विकास सम्भव है। उन्होंने आधुनिक शिक्षा प्रणाली में गुरुकुलीय मूल्यों के समन्वय की आवश्यकता को रेखांकित किया। डॉ. तुषारकांत शास्त्री ने भारतीय शास्त्रों, वेदों एवं उपनिषदों के संदर्भ में गुरुकुल परम्परा की वैज्ञानिकता को स्पष्ट करते हुए बताया कि योग, आचार-विचार एवं जीवनशैली के माध्यम से व्यक्तित्व का समग्र विकास सम्भव है वहीं डॉ. केवलराम चक्रधारी ने योग को व्यवहारिक जीवन से जोड़ते हुए कहा कि गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति आज भी समाज के नैतिक एवं सांस्कृतिक उत्थान का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

सेमिनार में प्रदेशभर के विद्वानों ने ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से सहभागिता करते हुए योग को समग्र जीवन पद्धति बताया तथा इसके विभिन्न अंगों के पालन का संदेश दिया। उन्होंने स्वस्थ, संतुलित एवं संस्कारयुक्त जीवन शैली अपनाने की प्रेरणा भी दी। योग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. रत्नेश पाण्डेय ने बताया कि योग आधारित शिक्षा से विद्यार्थियों का मानसिक, शारीरिक एवं आध्यात्मिक विकास सुनिश्चित होता है। इससे न केवल शैक्षणिक गुणवत्ता में वृद्धि होती है  बल्कि एक स्वस्थ एवं सशक्त समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलता है।

दो दिवसीय इस अंतरराष्ट्रीय योग सेमिनार के दौरान विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों द्वारा योग एवं भारतीय शिक्षा दर्शन से संबंधित अनेक शोध पत्र प्रस्तुत एवं प्रकाशित किए गए। इन शोध पत्रों में योग, गुरुकुल परम्परा, समग्र स्वास्थ्य, शिक्षा में योग की भूमिका तथा समाजोपयोगी अनुसंधान विषयों पर गहन अध्ययन प्रस्तुत किया गया। विद्वानों एवं अतिथियों ने इन शोध कार्यों की सराहना करते हुए भविष्य में योग अनुसंधान को और अधिक सशक्त बनाने पर बल दिया।

समापन सत्र में योग विभाग के अखिलेश विश्वकर्मा द्वारा सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया तथा भविष्य में इस प्रकार के शैक्षणिक एवं योग आधारित कार्यक्रमों के सतत आयोजन की प्रतिबद्धता दोहराई गई। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकगण, शोधार्थी, योग विद्यार्थी एवं विभिन्न विभागों के छात्र–छात्राओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

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