उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के हजारों अनुदेशकों के पोछे आंसू

अब 17 हजार  मिलेंगे, 10 साल सेवा पूरी करने वाले स्थायी माने जाएंगे

खेलपथ संवाद

नई दिल्ली। लम्बे समय बाद उत्तर प्रदेश के हजारों अनुदेशकों के चेहरे पर मुस्कान लौटी है। यह सब उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों के न्याय और मानवीय सुचिता से सम्भव हो सका है। अब उत्तर प्रदेश के उच्च प्राथमिक स्कूलों में काम कर रहे हजारों संविदा अनुदेशकों को प्रतिमाह रुपये 17 हजार मानदेय मिलेगा। इतना ही नहीं 10 साल सेवा पूरी करने वाले अनुदेशकों को व्यावहारिक रूप से स्थायी माना जाएगा।

शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि इन शिक्षकों को सिर्फ नौ हजार रुपये पर लम्बे समय तक काम कराना अन्यायपूर्ण है और यह जबरन श्रम यानी 'बेगार' यानी बंधुआ मजदूरी की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज करते हुए संविदा अनुदेशकों के पक्ष में बड़ा आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने फैसला दिया कि संविदा शिक्षकों को वर्ष 2017-18 से 17 हजार रुपये मासिक मानदेय का अधिकार है।

अदालत ने कहा कि 11 महीने के अनुबंध के नाम पर साल दर साल काम लेते रहना और वेतन न बढ़ाना गलत है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार एक अप्रैल, 2026 से 17 हजार रुपये प्रतिमाह के हिसाब से भुगतान शुरू करे। साथ ही बकाया राशि छह महीने के भीतर चुकाई जाए। अदालत ने कहा कि जो अनुदेशक लगातार 10 साल से अधिक समय से काम कर रहे हैं, उन्हें व्यवहार में स्थायी माना जाएगा।

अदालत ने कहा कि इन संविदा अनुदेशकों का मानदेय हमेशा के लिए सात हजार रुपये तय रखना अनुचित श्रम व्यवहार है। यह संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है, जो बेगार और जबरन श्रम पर रोक लगाता है। कोर्ट ने कहा कि अनुदेशक लगातार काम कर रहे हैं, पद भी निरंतर बने हुए हैं, इसलिए काम की प्रकृति स्थायी है। ऐसे में इन्हें सिर्फ अस्थायी बताकर कम भुगतान नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि मानदेय की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए, कम से कम हर तीन साल में संशोधन जरूरी है।

राज्य में सर्व शिक्षा अभियान के तहत वर्ष 2013 में कक्षा 6 से 8 के लिए पार्ट टाइम संविदा शिक्षकों की भर्ती का विज्ञापन निकला था। इन्हें 11 महीने के अनुबंध पर सात हजार रुपये मानदेय पर रखा गया। शर्त यह भी थी कि वे कहीं और नौकरी नहीं करेंगे। अनुबंध खत्म होने के बाद भी इन्हें हर साल नवीनीकरण के साथ काम पर रखा गया, लेकिन मानदेय नहीं बढ़ाया गया। बढ़ोत्तरी की सिफारिशें होने के बावजूद भुगतान वही रहा। इससे नाराज शिक्षकों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 2017 से 17 हजार रुपये देने का आदेश दिया था। बाद में खंडपीठ ने इसे सीमित अवधि तक लागू किया। इसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि शिक्षा राष्ट्र निर्माण की नींव है और शिक्षक समाज में सर्वोच्च सम्मान के पात्र हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि भुगतान की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी, जो बाद में केंद्र से हिस्सेदारी वसूल सकती है।

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की उन दलीलों को सिरे से ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना के लिए केंद्र से पैसा नहीं मिलने के बाद राज्य सरकार को पूरा मानदेय देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। यूपी सरकार की दलीलों को ठुकराते हुए शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इन अनुदेशकों को मानदेय देने की प्रारम्भिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, जो भुगतान करो और वसूल करो के सिद्धांत पर भारत सरकार से केंद्र सरकार का योगदान वसूल करने के लिए स्वतंत्र है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि अनुदेशक अपने सबसे महत्वपूर्ण सालों में युवा दिमागों के साथ जुड़ते हैं और ऐसा करके वे दृष्टिकोण, आचरण और आदर्शों को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसलिए, अगर हम देश के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं, तो हमें उन अनुदेशकों को पहचानना, महत्व देना और उनका समर्थन करना चाहिए जो चुपचाप चरित्र निर्माण, मूल्यों को स्थापित करके और युवाओं का मार्गदर्शन करके देश की नियति को आकार दे रहे हैं।

कोर्ट ने फैसले में कहा है कि इन अनुदेशकों के वेतन को स्थिर नहीं रहने दिया जा सकता है। इसे प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड (पीएबी) या किसी अन्य प्राधिकार द्वारा, जैसा कि केंद्र सरकार/राज्य सरकार द्वारा योजना या संशोधित योजना के तहत तय किया जा सकता है, कम से कम हर तीन साल में एक बार संशोधित किया जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान के तहत पूरे राज्य में अपर प्राइमरी स्कूलों (कक्षा 6-8) में अनुबंध के आधार पर पार्ट टाइम इंस्ट्रक्टर/टीचर्स को नियुक्त करने का फैसला किया था। इसके तहत सरकार ने 2013 में एक विज्ञापन जारी किया गया था जिसमें पार्ट टाइम अनुदेशकों की नियुक्ति के लिए योग्य उम्मीदवारों से आवेदन मांगे गए थे। इसके तहत शिक्षक को 11 माह की अवधि के लिए अनुबंध पर 7,000 रुपये प्रतिमाह के निश्चित मानदेय पर नियुक्ति हुई।

नियुक्ति की शर्तों के अनुसार कहा गया कि नियुक्त किए गए अनुदेशक सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कहीं और कोई पार्ट टाइम या फुल टाइम नौकरी नहीं करेंगे। अनुबंध की अवधि खत्म होने के बाद उनका अनुबंध बढ़ता गया लेकिन उनका मानदेय 7,000 रुपये प्रतिमाह ही रहा, इसके बावजूद कि उचित अधिकारियों द्वारा इसे बढ़ाने की सिफारिशें की गई थीं। इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुदेशकों की याचिका पर मार्च 2017 से सरकार को 17,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय देने के आदेश दिए थे।

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