भारतीय पोल वाल्टरों को टीटीई ने जबरन ट्रेन से उतारा

एमपी के राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी देव मीना और कुलदीप यादव को हुई परेशानी

खेलपथ संवाद

नई दिल्ली। भारत के शीर्ष पोल वॉल्टर्स, राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी देव मीना और विश्वविद्यालय चैम्पियन कुलदीप यादव सोमवार को एक ट्रेन से जबरन उतार दिए गए, जिसके बाद उन्हें पनवेल स्टेशन पर लगभग चार से पांच घंटे तक फंसा रहना पड़ा। यह घटना बेंगलूरू में आयोजित ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी एथलेटिक्स चैम्पियनशिप से लौटते समय हुई, जहां वे भोपाल के लिए सफर कर रहे थे।

ट्रेन में तैनात टीटीई ने उनके पोल वॉल्ट पोल्स को अनधिकृत सामान बताते हुए आपत्ति जताई। यह पोल्स अत्यधिक महंगे, लगभग दो लाख रुपये प्रति पीस, पांच मीटर लम्बे और खिलाड़ी के प्रदर्शन के लिए जरूरी होते हैं। टीटीई को समझाने की कोशिश, अधिकारियों से बात करने की मांग और तत्काल जुर्माना चुकाने की पेशकश, लेकिन सबको खारिज कर दिया गया। आक्रोशित देव मीना ने वीडियो में कहा, 'हम यहां चार से पांच घंटे से बैठे हैं। अगर हमारे साथ ऐसा हो रहा है, तो हमारे जूनियर्स के साथ क्या होगा?

अगर एक इंटरनेशनल लेवल के एथलीट के साथ ऐसा भारत में हो सकता है, तो मैं क्या कहूं?' पोल वॉल्ट में उपयोग होने वाले पोल्स न तो किराये पर मिलते हैं और न ही आसानी से बदले जा सकते हैं। एक खिलाड़ी इन्हें अपने वजन, तकनीक और ऊंचाई के हिसाब से चुनता है, इसलिए यात्रा में इन्हें साथ ले जाना अनिवार्य होता है। मीना ने कहा, 'सबको हमसे एशियन गेम्स के लिए क्वालीफाई करने की उम्मीद है, लेकिन अब तो खेल खत्म हो गया। हम यहीं बैठे हैं, इंतजार कर रहे हैं कि कोई हमारी मदद कर सके।' घंटों तक यह गतिरोध चलता रहा, जिसकी वजह से एथलीट्स अपनी कनेक्टिंग ट्रेन भी मिस कर गए।

पोल वॉल्टर्स के लिए उनका उपकरण किसी भी हाल में छोड़ा नहीं जा सकता। बैट या रैकेट के विपरीत, पोल एथलीट के वजन और जंप की ऊंचाई के अनुसार कस्टम बनाया जाता है। आखिरकार लंबे विवाद और जुर्माना भरने के बाद खिलाड़ियों को एक अन्य ट्रेन से जाने की अनुमति मिली, लेकिन शर्त यह रखी गई कि यदि किसी यात्री ने पोल्स के कारण शिकायत की, तो कार्रवाई की जाएगी।

फ्लाइट में भी होता है ऐसा, कुलदीप यादव का आरोप

कुलदीप यादव, जिन्होंने बेंगलूरू चैम्पियनशिप में 5.10 मीटर की छलांग लगाकर गोल्ड जीता, बोले, 'फ्लाइट में भी यही समस्या, ट्रेन में भी यही समस्या। खिलाड़ी जाए तो कहाँ जाए? हमें यात्रा के लिए जगह चाहिए। पैसे लगेंगे तो हम देंगे, लेकिन हमारे उपकरण सुरक्षित होने चाहिए।' खिलाड़ियों ने यह भी कहा कि इस तरह की घटनाएं न केवल आर्थिक जोखिम दिखाती हैं, बल्कि भावनात्मक थकावट भी पैदा करती हैं, खासकर तब जब देश उनसे एशियन गेम्स और बड़े टूर्नामेंट में पदक की उम्मीद करता है।

घटना के कुछ ही दिन पहले कुलदीप यादव ने मीट रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण जीता था। उनकी पोल एक प्रयास के दौरान टूट भी गई थी, लेकिन फिर भी उन्होंने जीत हासिल की। एनएनआईएस स्पोर्ट्स को व्हाट्सएप पर जवाब देते हुए उन्होंने लिखा, 'देव मीना और मैं साथ में ट्रेनिंग कर रहे हैं ताकि हम भारत में पोल वॉल्टिंग का स्तर ऊपर उठा सकें।'

सोशल मीडिया पर घटना के बाद बड़ा प्रश्न खड़ा हुआ- क्या भारत एथलीट्स को सम्मानजनक बुनियादी सुविधाएं देने में तैयार है, जबकि देश 2036 ओलंपिक की मेजबानी का सपना देख रहा है? एक ओर भारत विश्व स्तरीय प्रदर्शन की उम्मीद कर रहा है, दूसरी ओर शीर्ष खिलाड़ियों को यात्रा में अपने उपकरण बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह विरोधाभास बताता है कि आकांक्षाओं और वास्तविकता के बीच खाई कितनी बड़ी है।

रिलेटेड पोस्ट्स