शिक्षा से मिसाल बनीं मेवात की 11 बहनें

रियाज खान की बेटियों ने उच्च शिक्षा हासिल कर बढ़ाया गौरव
खेलपथ संवाद
चंडीगढ़।
शिक्षा व्यक्ति के गुणों में इजाफा करने के साथ समाज के विकास में सहायक होती है। सचमुच यदि मां-बाप ठान लें कि शिक्षा में ही बच्चों का भविष्य निहित है तो समाज की रूढ़ियां व बाधाएं बेमानी हो जाती हैं। खासकर बेटियों की शिक्षा से तो कई पीढ़ियां शिक्षित हो जाती हैं। निस्संदेह, उच्च शिक्षा जहां रोजगार के द्वार खोलती है वहीं व्यक्ति के दृष्टिकोण में व्यापकता लाती है। एक सभ्य व संस्कारित नागरिक बनाती है। 
हरियाणा में शिक्षा के मामले में बेहद पिछड़े कहे जाने वाले मेवात में रियाज खान की बेटियों ने उच्च शिक्षा हासिल करके ऐसी मिसाल पेश की है जो मेवात ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिये अनुकरणीय है। एक बंद समाज में जहां बेटियों की उच्च शिक्षा को कमोबेश वर्जित सा मान लिया जाता हो, वहां ग्यारह बहनों ने उच्च शिक्षा प्राप्त करके न केवल कई धारणाओं को ध्वस्त किया बल्कि आज आर्थिक रूप से स्वावलंबी भी बनी हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि वे पढ़ाई करने के बाद उन बच्चों को शिक्षित कर रही हैं, जिन्हें पढ़ने-लिखने के पर्याप्त अवसर नहीं मिले। हालांकि, बेटियों को उच्च शिक्षा देकर अपने पैरों पर खड़ा करने का संकल्प लेने वाले पिता रियाज खान इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी प्रगतिशील सोच व शिक्षा के जुनून से बेटियों के परिवार ज्ञान से महक रहे हैं। एक समय था कि उनके जानने वाले लोग व रिश्तेदार ताने देते थे कि बेटियों को ऊंची शिक्षा क्यों दे रहे हो, कल वे अपने ससुराल चली जाएंगी, लेकिन आज वे ही लोग इन बेटियों की कामयाबी से उत्साहित व प्रेरित हैं। ये बेटियां आज आर्किटेक्ट, एमबीए व अन्य स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम पास करके मेवात के इलाके में शिक्षा की अलख जगा रही हैं। इतना ही नहीं, एक दशक पहले पिता के जाने के बाद बड़ी बेटियों ने छोटी बेटियों की पढ़ाई को निरंतर जारी रखा। उनके विवाह आदि में सहयोग करके पिता के दायित्वों का भी निर्वहन किया। जिसके चलते पूरा परिवार शैक्षिक उपलब्धियों की वजह से क्षेत्र के लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
निस्संदेह, आज के दौर में शिक्षा ही वह अस्त्र है जो लड़कियों की वास्तविक आजादी और स्वावलंबन का मार्ग प्रशस्त करता है। जब वे पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होती हैं तो ससुराल में उनका सम्मान बढ़ता है। आर्थिक आजादी उन्हें सर्वांगीण विकास की राह दिखाती है। साथ ही समाज में प्रगतिशील सोच को प्रश्रय देती है। एक पढ़े-लिखे व्यक्ति का जीवन व देश के प्रति नजरिया प्रगतिशील हो जाता है। वे अपने नागरिक के रूप में मिले अधिकारों का तो उपयोग करते ही हैं, एक व्यक्ति के रूप में अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग होते हैं। हालिया अध्ययन बताते हैं कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाओं के नागरिक अधिकारों का अतिक्रमण करना कठिन होता है क्योंकि वे अपने अधिकारों के प्रति सजग होती हैं। उच्च शिक्षा से जहां उनमें आत्मविश्वास पैदा होता है, वहीं वे अन्याय के प्रति भी प्रतिकार करने में सक्षम हो जाती हैं। यह आत्मविश्वास उन्हें अभिभावकों द्वारा शिक्षा प्रदान करने के अवसरों से ही संभव है। 
समाज में धीरे-धीरे बेटियों के प्रति नजरिया बदल रहा है। पहले के मुकाबले जन्म लिंग अनुपात में सुधार तो हुआ है लेकिन इसमें निरंतर वृद्धि के लिये सतत प्रयासों की जरूरत है। जाहिर है एक पढ़ी -लिखी और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मां ही ससुरालियों के दबाव से मुक्त होकर लड़के-लड़की के भेद से मुक्त हो सकती है। वह अपने बच्चों का लालन-पालन और शिक्षा का दायित्व बेहतर ढंग से कर सकती है। 
समाज के प्रगतिशील सोच के लोगों का दायित्व है कि जो बच्चे गरीबी व पारिवारिक समस्याओं के चलते पढ़ नहीं पाते हैं, उन्हें पढ़ाई का अवसर उपलब्ध करायें। इस दिशा में जो सरकारी योजनाएं साक्षरता अभियान के लिये लायी गई हैं, उनका क्रियान्वयन भी समाज की जागरूकता से संभव है। निस्संदेह, शिक्षा के लक्ष्य पाना समाज के साझे प्रयासों से ही संभव है। जिसमें जागरूक अभिभावकों की भूमिका महत्पूर्ण हो जाती है। इन स्थितियों में मेवात की बेटियों की कामयाबी हर भारतीय के लिये प्रेरणा की मिसाल है।

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