सतत कृषि: हरियाली की ओर बढ़ता कदम

रवि प्रकाश मौर्य

आज जब जलवायु परिवर्तन, घटते जल संसाधन और बढ़ती लागत के कारण किसान नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, सतत कृषि ही एक ऐसा समाधान है जो भविष्य को सुरक्षित कर सकता है। परम्परागत खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग मिट्टी की उर्वरता को नुकसान पहुँचा रहा है। इससे न केवल पैदावार प्रभावित हो रही है, बल्कि उत्पादन लागत भी बढ़ रही है। ऐसे में आधुनिक तकनीकों और पारंपरिक ज्ञान का संतुलन बनाकर ही हरित क्रांति को आगे बढ़ाया जा सकता है।

तकनीक से बढ़ेगी पैदावार और घटेगी लागत

आज की स्मार्ट खेती में आधुनिक तकनीकों का उपयोग किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। सटीक कृषि, ड्रोन तकनीक, स्मार्ट सिंचाई प्रणाली और डिजिटल मिट्टी परीक्षण से किसान अपनी भूमि की स्थिति का बेहतर आकलन कर सकते हैं। इससे जल, उर्वरक और अन्य संसाधनों की बर्बादी कम होती है और उत्पादन बढ़ता है। विश्व बैंक की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि इन तकनीकों के उपयोग से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा 10-15% तक बढ़ सकती है, जिससे मिट्टी का स्वास्थ्य लम्बे समय तक सुरक्षित रहेगा।

मध्य प्रदेश के किसान सुरेश मिश्रा का उदाहरण प्रेरणादायक है। उन्होंने जैविक खाद और सटीक कृषि तकनीकों को अपना कर अपनी फसल उत्पादन में 18% से 25% तक की वृद्धि दर्ज की। नतीजतन, उनकी आय में सुधार हुआ और उन्होंने आसपास के किसानों को भी जैविक खेती के लिए प्रेरित किया।

जैविक और प्राकृतिक खेती से मिलेगी नई राह

रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता लगातार गिर रही है। इसका समाधान जैविक खेती में छिपा है। कम्पोस्ट, हरित खाद और गोबर की खाद जैसी पारम्परिक पद्धतियाँ न केवल मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती हैं, बल्कि किसानों की लागत भी कम करती हैं।

नेशनल एग्रीकल्चर इन साइट्स की रिपोर्ट के अनुसार, जैविक कृषि अपनाने से किसानों को 25% तक लागत में कटौती और 15% तक अतिरिक्त मुनाफा हो सकता है। इसके साथ ही, एग्रीफॉरेस्ट्री प्रणाली, जहाँ फसलों के साथ वृक्षारोपण किया जाता है, जल संरक्षण, मिट्टी कटाव रोकने और जैव विविधता को बढ़ाने में मदद करती है। ‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ की रिपोर्ट बताती है कि इस मॉडल को अपनाने वाले किसानों को लकड़ी, फल और अन्य कृषि उत्पादों से अतिरिक्त आय के अवसर मिलते हैं।

सरकार की योजनाएँ और समर्थन

भारत सरकार सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएँ चला रही है। परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY), राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) और पीएम-किसान योजना जैसी योजनाएँ किसानों को जैविक खेती और नवीन तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार, सतत कृषि अपनाने से वैश्विक स्तर पर 15-20% तक पैदावार में वृद्धि और 25% तक जल संरक्षण सम्भव है।

हरित भविष्य की ओर एक कदम

भारत की लगभग 60% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। यदि किसान सतत कृषि अपनाएँ, तो उनकी आय में वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण भी संरक्षित रहेगा। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी को इस दिशा में योगदान देना होगा। किसान, वैज्ञानिक और नीति-निर्माता मिलकर यदि इस दिशा में आगे बढ़ें, तो भारत का कृषि भविष्य सच में 'हरा-भरा' बन सकता है। हरित खेत, खुशहाल किसान, यही भारत की असली ताकत है।

(लेखकः उप-विभागीय अधिकारी (कृषि), सम्बलपुर, (ओड़िशा) में कार्यरत हैं)

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