दिव्यांग अधिकार रक्षा

समाज में समावेश की दिशा में कदम

ऐसे समय में जब एक संभावित वोट बैंक सभी के ध्यान का केंद्र है, यह उत्साहजनक है कि हरियाणा ने समाज के एक छोटे से वर्ग दिव्यांग व्यक्तियों के कल्याण के लिए अहम क़दम उठाया है। हरियाणा अधिकार, विकलांगता अधिनियम, 2016 अधिकारों के तहत उनकी रोजमर्रा के मामलों में सहायता करने और किसी भी तरह से शोषण से मुक्त कराने का एक प्रयास है। योजना को गति में लाते हुए, सरकार ने कई उपाय किए हैं, जिनमें मुख्य है, समग्र व्यक्तिगत देखभाल के लिए ‘सीमित अभिभावक’ की अवधारणा। यह दिव्यांग हित में उनकी ओर से निर्णय लेते समय व्यक्तिगत हितों की रक्षा के लिहाज़ से हर अभिभावक के लिए बाध्यकारी होगा। जीवन, भोजन, कपड़े और आश्रय, शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य देखभाल, और यहां तक ​​कि धार्मिक जरूरतों और मनोरंजन के अधिकार को सुनिश्चित करेगा। संक्षेप में, आत्मसम्मान और गरिमा के साथ जीवन का एक पूर्ण अनुभव अब दिव्यांगों को नई सुविधाओं के तहत उपलब्ध होगा। ऐसा कोई कारण नहीं है कि अलग तरह से जीवन जीने की मजबूरी के बावजूद दिव्यांगों को जीवन के किसी भी पहलू से वंचित किया जाए, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो। हरियाणा ने इन जरूरतों को पहचाना है और उनके हित में कार्य करने के लिए तैयार है। अन्य राज्यों को इस दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए।
हरियाणा की कार्ययोजना में एक समर्पित कोष की भी कल्पना की गई है, जिसे राज्य और केंद्र सरकार, कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी पहल और दान से अनुदान प्राप्त होगा। विकलांगता पर अनुसंधान के लिए एक समिति भी, सुविधा- संरचना का हिस्सा होगी। सरकार को एक ही समय में सभी सार्वजनिक स्थानों पर रैंप और अन्य सहायक बुनियादी ढांचे को अनिवार्य बनाना चाहिए। उनके हित में नियमों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित होना चाहिए क्योंकि यह समाज में उनके पूर्ण समावेश की दिशा में बहुत बुनियादी कदम है। इच्छा, प्रयास या धन की कमी जैसे किसी कारक से एक अच्छी पहल नहीं खोनी चाहिए। इस कदम द्वारा हरियाणा ने अपने बदलते सामाजिक संकेतक के रूप में एक और बेहतर कदम उठाया है।

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