खूब लड़ी हॉकी बेटियां, न लिख सकीं इतिहास
हॉकी विश्व कपः आंसुओं को कमजोरी नहीं, ताकत बनाने की जरूरत
कुन्दन श्रीवास्तव की कलम से
नई दिल्ली। इन रोते, सुबकते हुए चेहरों को आंसुओं में डूबा देखेंगे तो आपकी भी आंखें नम हो जाएंगी। मगर एम्स्टर्डम में ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध खेले गए मुकाबले की तफ़्सीर, व्याख्या करें, तो शायद आप भी यही कहेंगे कि इन लम्हों की जिम्मेदार भारतीय टीम खुद ही है। क्योंकि मंज़िल ने उसे ठुकराया नहीं था, बल्कि उसने मंज़िल तक पहुंचने के कई रास्ते बनाए, मगर उन रास्तों को मुकाम तक नहीं पहुंचा सकी।
इतना शानदार प्रदर्शन, इतनी बेहतरीन हॉकी, इतना जज़्बा… और फिर भी सेमीफाइनल की दहलीज़ पर आकर भी कहानी अधूरी रह गई। खेल भी शायद ज़िंदगी की तरह ही होता है। वह हमेशा मेहनत का पूरा हिसाब नहीं देता। कभी-कभी आप पूरी शिद्दत से लड़ते हैं, हर मोर्चे पर बेहतर दिखाई देते हैं, सामने वाले को सांस लेने तक की मोहलत नहीं देते, मगर आखिर में एक छोटी-सी कमी आपकी पूरी कहानी का रुख़ बदल देती है। आस्ट्रेलिया के खिलाफ भारतीय महिला हॉकी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
इस रंग बदलते हॉकी मैच में सिर्फ मौके बनाना काफी नहीं होता, उन मौकों को गोल में भुनाना भी पड़ता है। आगे बढ़ने के लिए रास्ते तलाशना ही नहीं, उस रास्ते के आखिरी सिरे तक पहुंचना भी पड़ता है। एम्स्टर्डम में भारतीय विमेंस हॉकी टीम के पास मौके थे। मगर उन मौकों को गोल में तब्दील करने की वह धार नहीं थी, जिसकी जरूरत इस मुकाबले को जीतने के लिए थी। और यही वह कमी थी, जिसने भारत को एफआईएच हॉकी विमेंस वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में दाख़िले से महरूम कर दिया।
मैच खत्म हुआ तो स्कोर-बोर्ड पर दोनों तरफ शून्य था। एक शून्य ऑस्ट्रेलियाई टीम को सेमीफाइनल में दस्तक देने का मौका दे गया, तो वही शून्य भारतीय टीम को अंतिम चार में दाख़िले से महरूम कर गया। खेल की यही विडम्बना है। एक ही नतीजा किसी के लिए मंज़िल बन जाता है और किसी के लिए मायूसी की वजह।
दरअसल, ऑस्ट्रेलिया ने टूर्नामेंट के अपने पिछले मुकाबलों में जितने गोल किए थे, वही आंकड़ा आज उसके काम आया। भारत और ऑस्ट्रेलिया का गोल अंतर बराबर था, लेकिन किए गए गोलों की संख्या में ऑस्ट्रेलिया आगे था। लिहाजा गोलरहित ड्रॉ के बावजूद ऑस्ट्रेलिया सेमीफाइनल की राह पकड़ गया और भारतीय टीम को पांचवें-छठे स्थान की लड़ाई तक सीमित रहना पड़ा।
ऑस्ट्रेलिया ने 51 प्रतिशत गेंद पर कब्जा रखा तो भारत 49 प्रतिशत के साथ लगभग बराबरी पर था। ऑस्ट्रेलिया ने 20 बार भारतीय सर्किल में दस्तक दी, जबकि भारत 11 बार ऑस्ट्रेलियाई घेरे तक पहुंचा। ऑस्ट्रेलिया ने 13 शॉट लिए और भारत की तरफ से गोल की दिशा में सिर्फ एक शॉट गया। दोनों टीमों को पेनल्टी कॉर्नर मिले-ऑस्ट्रेलिया को पांच और भारत को एक, लेकिन दोनों ही टीमें उन्हें गोल में नहीं बदल सकीं। ये आंकड़े शायद भारतीय हार की पूरी कहानी नहीं कहते, मगर कहानी का सबसे जरूरी हिस्सा जरूर बताते हैं।
हॉकी में गेंद पर कब्जा होना और सर्किल तक पहुंच जाना मंज़िल नहीं है। असली सवाल उसके बाद शुरू होता है-गोल कौन करेगा? भारत के पास आक्रमण के कुछ अच्छे लम्हे आए। ज्योति, नवनीत कौर, लालरेमसियामी, दीपिका, सुनीलिता टोप्पो और उनकी साथी खिलाड़ियों ने पूरी कोशिश की। भारतीय टीम ने अपने अंदाज़ में मुकाबला करने का माद्दा दिखाया। लेकिन आखिरी पास, आखिरी शॉट और गोलपोस्ट के सामने वह निर्णायक फिनिशिंग गायब रही, जो एक शानदार हमले को गोल में बदल देता है।
कितना अजीब है न—कभी एक गोल किसी टीम को इतिहास के सफ़्हे का हिस्सा बना देता है और कभी एक गोल का न होना किसी टीम को इतिहास के पन्ने तक पहुंचने से रोक देता है। आज भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच वही हुआ।
भारत की गोलकीपर सविता और बिचु देवी ने अपनी तरफ से पूरी जिम्मेदारी निभाई। भारतीय रक्षा ने भी कई मौकों पर ऑस्ट्रेलियाई हमलों का सामना किया। लेकिन दूसरी तरफ के आंकड़े यह भी बताते हैं कि ऑस्ट्रेलिया ने भारतीय गोल पर कहीं ज्यादा कोशिशें कीं। लिहाजा यह मुकाबला सिर्फ भारतीय फिनिशिंग की कहानी नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के बेहतर आक्रामक दबाव और भारत की उस कमी की कहानी भी है, जहां उसे अपने हमलों को और धारदार बनाना था।
फिर भी इस मैच को सिर्फ आंकड़ों की कठोर निगाह से देखना शायद भारतीय खिलाड़ियों के साथ नाइंसाफी होगी। क्योंकि मैदान पर उनकी कोशिशों में कोई कमी नहीं थी। कमी थी तो उस आखिरी लम्हे की, जब कोशिश को नतीजे में बदलना था।
दरअसल, सेमीफाइनल की यह कहानी सिर्फ आज के 60 मिनट में नहीं लिखी गई थी। इससे पहले चीन और नीदरलैंड के बीच खेले गए मुकाबले ने भारत के लिए उम्मीद की एक खिड़की खोली थी। नीदरलैंड ने चीन को 4-1 से हराकर भारतीय उम्मीदों को फिर सांस दी थी। चीन की हार ने भारत को ऑस्ट्रेलिया के सामने आखिरी मुकाबले में ऐसा मौका दिया, जहां जीत उसे अंतिम चार में पहुंचा सकती थी। मगर मंज़िल तक पहुंचने के लिए सिर्फ उम्मीद का मिल जाना काफी नहीं होता। उम्मीद को हक़ीक़त में बदलना पड़ता है।
नीदरलैंड ने अपने तीनों मुकाबले जीतकर नौ अंक के साथ अपना दबदबा कायम किया। चीन दो अंकों तक सीमित रहा और भारत को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैदान पर उतरने से पहले एक और ज़िंदगी मिल गई। ऐसा लगा जैसे किस्मत ने बंद दरवाज़े पर एक बार फिर दस्तक दी हो। लेकिन खेल में किस्मत दरवाज़ा खोल सकती है, उसके पार ले जाने का काम खिलाड़ी को ही करना पड़ता है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के खाते में दो-दो अंक आए। गोल अंतर भी बराबर रहा। फिर फैसला किए गए गोलों की संख्या पर पहुंचा, जहां ऑस्ट्रेलिया भारत से आगे निकल गया। वही मामूली-सा फर्क निर्णायक बन गया। कितनी महीन होती है खेल की यह रेखा! एक तरफ सेमीफाइनल का टिकट था, दूसरी तरफ पांचवें-छठे स्थान की लड़ाई। फर्क सिर्फ इतना कि आपने कितने मौके बनाए नहीं, बल्कि कितने मौकों को गोल में बदला।
और शायद इसी वजह से इन खिलाड़ियों की आंखों में आए आंसू इतने भारी थे। ये आंसू सिर्फ सेमीफाइनल से चूकने के नहीं हैं। इनमें उन तमाम मौकों का अफसोस है, जो सामने आए और फिर हाथ से निकल गए। तस्वीर में झुका हुआ चेहरा सिर्फ एक खिलाड़ी का चेहरा नहीं लगता- वह उस पूरी टीम की तस्वीर बन जाता है, जिसने सपना देखा था और फिर उसे अपनी आंखों के सामने दूर जाते देखा। लेकिन इन आंसुओं में हार की पूरी कहानी मत तलाशिए।
इन चेहरों पर सिर्फ मायूसी नहीं है। इनमें एक ऐसी टीम का चेहरा भी है, जिसने दुनिया को बताया है कि भारतीय महिला हॉकी अब बड़ी टीमों के सामने सिर्फ मुकाबला करने नहीं, मुकाबले की कहानी बदलने का इरादा लेकर उतरती है। बस अब उस इरादे को एक और हुनर चाहिए- मौकों को मुकाम में बदलने का। भारतीय टीम के लिए यह अंत नहीं है। शायद यह एक आईना है।
ऐसा आईना, जिसमें टीम अपने अच्छे खेल को भी देख सकती है और अपनी कमियों को भी। उसे देखना होगा कि लगभग बराबर गेंद पर कब्जा रखने के बावजूद ऑस्ट्रेलिया सर्किल में उससे लगभग दोगुनी बार क्यों पहुंचा? उसे देखना होगा कि पांच पेनल्टी कॉर्नर के सामने एक पेनल्टी कॉर्नर क्यों मिला? और सबसे बढ़कर—गोल की तरफ जाने वाले शॉट इतने कम क्यों रहे? क्योंकि बड़े टूर्नामेंट में खूबसूरत हॉकी याद रह जाती है, लेकिन इतिहास में जगह गोल लिखता है।
एम्स्टर्डम में भारत की आंखों में जो आंसू हैं, वे सिर्फ एक मैच के नहीं हैं। वे उन तमाम उम्मीदों के आंसू हैं, जो गोलपोस्ट तक पहुंचीं, मगर जाल को छू नहीं सकीं। और शायद यही खेल का सबसे कठोर फलसफ़ा है। मौके ज़िंदगी को भी मिलतीं हैं और खेलों में भी। मगर दोनों में फर्क बस इतना है कि ज़िंदगी कभी-कभी दूसरा मौका दे देती है… खेल हर बार नहीं देता। अब भारतीय टीम के पास सिर्फ एक काम बचा है—इन आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं, अपनी अगली कहानी की रोशनाई बना देना। क्योंकि सेमीफाइनल की मंज़िल छूट गई है। मगर सफ़र अभी बाक़ी है।
भारतीय हॉकी बेटियों की भावुक अपील
'हॉकी इंडिया लीग को बचा लो'
खेलपथ संवाद
एम्सटेलवीन। भारत की महिला हॉकी खिलाड़ियों ने महिला हॉकी इंडिया लीग (एचआईएल) को बचाने के लिए भावुक अपील करते हुए कहा कि इस टूर्नामेंट ने युवा खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विश्व कप खेल रही भारतीय टीम में 11 युवा खिलाड़ी शामिल हैं।
भारत ने ओलम्पिक चैम्पियन नीदरलैंड्स के विरुद्ध केवल एक मैच हारा है, जबकि अपने पहले मैच में ओलम्पिक रजत पदक विजेता चीन को 2-2 से ड्रॉ पर रोका था। ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध गोलरहित ड्रॉ के बाद भारत सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर हो गया। ओडिशा वॉरियर्स को 2024-25 में पहला एचआईएल खिताब दिलाने वाली अनुभवी मिडफील्डर नेहा ने कहा कि मुझे लगता है कि हमने भारत में लड़कियों को हॉकी स्टिक थामने के लिए प्रेरित करने की पूरी कोशिश की है। लोग अपने बच्चों को व्यक्तिगत खेल खेलते देखना पसंद करते हैं, लेकिन इससे उनकी उम्मीद बंधनी चाहिए।
भारत की कप्तान सलीमा टेटे ने भी कहा कि अच्छी बेंच स्ट्रेंथ तैयार करने में लीग की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय टीम में कई ऐसी खिलाड़ी हैं जिन्होंने एचआईएल में शानदार प्रदर्शन के दम पर टीम में जगह बनाई। इससे उन्हें राष्ट्रीय शिविर के लिए चुने जाने का मौका मिलता है, जो उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। सलीमा ने कहा कि यह तो हमारे लिए बस शुरुआत है और अभी बहुत कुछ हासिल करना बाकी है। इसके लिए एचआईएल बेहद जरूरी है ताकि हमारी प्रतिभाओं का दायरा बढ़े और लड़कियों को अंतरराष्ट्रीय हॉकी के दबाव को संभालने का अच्छा अनुभव मिल सके।
