भारतीय हॉकी के स्वर्णिम दौर के महानायक बलबीर सिंह को नमन

स्मृति विशेषः तीन ओलम्पिक गोल्ड में निभाई ऐतिहासिक भूमिका

खेलपथ संवाद

नई दिल्ली। भारतीय हॉकी के इतिहास में बलबीर सिंह का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। वह उस दौर के सबसे बड़े सितारों में शामिल रहे, जिसे भारतीय हॉकी का स्वर्णिम युग कहा जाता है। लगातार तीन ओलम्पिक खेलों में भारतीय टीम को स्वर्ण पदक दिलाने में उनका योगदान बेहद अहम रहा। बलबीर सिंह का जन्म 10 अक्टूबर, 1924 को पंजाब के हरिपुर गांव में हुआ था।

बलबीर सिंह को बचपन से ही हॉकी का शौक था और उन्होंने महज पांच साल की उम्र में खेलना शुरू कर दिया था। शुरुआत में वह गोलकीपर के रूप में खेले, फिर डिफेंस में अपनी भूमिका निभाई। बाद में जब उन्हें स्ट्राइकर के तौर पर खेलने का मौका मिला तो उनके खेल में नया निखार आया और वह तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने लगे। बलबीर सिंह ने 1946 और 1947 में लगातार दो बार पंजाब को राष्ट्रीय हॉकी खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई। खास बात यह रही कि 1946 से पहले पंजाब को 14 वर्षों तक इस खिताब का इंतजार था। घरेलू स्तर पर शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्हें भारतीय टीम में जगह मिली।

भारतीय हॉकी के महान सेंटर-फॉरवर्ड माने जाने वाले बलबीर सिंह ने 1948 के लंदन ओलम्पिक, 1952 के हेलसिंकी ओलम्पिक तथा 1956 के मेलबर्न ओलम्पिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने 1948 ओलम्पिक में कुल आठ गोल किए, जबकि 1952 हेलसिंकी ओलम्पिक में नौ गोल दागे। लंदन ओलम्पिक फाइनल में उनके दो गोल भारत की जीत में निर्णायक साबित हुए।

हेलसिंकी ओलम्पिक के फाइनल में नीदरलैंड के खिलाफ बलबीर सिंह ने अकेले पांच गोल किए थे। भारत ने यह मुकाबला 6-1 से जीता था। ओलम्पिक पुरुष हॉकी फाइनल में किसी एक खिलाड़ी द्वारा किए गए सबसे ज्यादा गोल का यह रिकॉर्ड आज भी कायम है। वहीं, सेमीफाइनल में ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ उन्होंने शानदार हैट्रिक भी लगाई थी। 1956 मेलबर्न ओलम्पिक में भारत ने पाकिस्तान को हराकर लगातार तीसरा गोल्ड मेडल जीता। उस मुकाबले में बलबीर सिंह चोटिल हाथ के बावजूद मैदान में उतरे थे।

बलबीर सिंह सीनियर 1958 एशियन गेम्स में रजत पदक जीतने वाली भारतीय टीम का भी हिस्सा रहे। 1960 में हॉकी से संन्यास लेने के बाद भी उन्होंने भारतीय हॉकी की सेवा जारी रखी। वह टीम के साथ कोच, मैनेजर और चयनकर्ता के रूप में जुड़े रहे और युवा खिलाड़ियों का मार्गदर्शन किया। भारतीय खेलों में उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1957 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। उनके जीवन और भारतीय हॉकी के स्वर्णिम दौर पर आधारित गोल्ड फिल्म भी बनी, जिसमें अक्षय कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई थी। भारतीय हॉकी के इस महान खिलाड़ी का 25 मई, 2020 को निधन हो गया। हालांकि, खेल जगत में उनका योगदान और उपलब्धियां आज भी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।

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