दुनिया की सबसे बड़ी क्रिकेट लीग आईपीएल पर उठ रहीं उगलियां

पिच पर पिकनिक, ड्रेसिंग रूम में उड़ता धुआं, बी.सी.सी.आई. सख्त

बीसीसीआई का सख्त दखल और सात पेज की एडवाइजरी जारी

खेलपथ संवाद

चंडीगढ़। क्रिकेट की पवित्रता पर उठती उंगलियां इस बात का संकेत है कि यह अब भद्रजनों का खेल नहीं रहा। क्रिकेटर मर्यादा उल्लंघन करने के बाद भी साफ बच निकलते हैं। जबकि सजा ऐसी हो जो नजीर बने। खैर आईपीएल का यह संस्करण मैदान के बाहर के विवाद जहां अतीत की फिक्सिंग और देर रात की पार्टियों की याद दिला रहे हैं, वहीं मैदान के अंदर का खेल अपने ही अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है।

मौजूदा आईपीएल लगातार आसमान छूते छक्कों का एक नीरस टूर्नामेंट बनता जा रहा है, जिसने बल्ले और गेंद के बीच के प्रतिस्पर्धात्मक संतुलन को पूरी तरह खत्म कर दिया है। एक समय था जब छोटे प्रारूप में 160 रन का लक्ष्य भी चुनौतीपूर्ण माना जाता था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

चंडीगढ़ के पास स्थित मुल्लांपुर के महाराजा यादवेंद्र सिंह पीसीए स्टेडियम में मैच के बाद जब प्रजेंटेशन सेरेमनी खत्म हुई और धूल छंटी, तो युवा क्रिकेट फैंस के एक समूह ने अचानक पिच की तरफ दौड़ लगा दी। मैदान पहले से ही क्षेत्र के तमाम वीआईपी और रसूखदार लोगों की भीड़ से भरा हुआ था, जिनमें से ज्यादातर का क्रिकेट खेलने से कोई लेना-देना नहीं था। जैसे ही सुरक्षाकर्मियों ने इन युवाओं को बाउंड्री के पास रोका, उन्होंने जोर से एक ऐसा सवाल पूछा जिसकी गूंज स्टेडियम के काफी दूर तक सुनाई दी। युवाओं का सवाल था कि जब दूसरों को अंदर जाने की अनुमति है, तो हमें क्यों नहीं?

इस इकलौते सवाल ने मौजूदा सीजन की सबसे बड़ी समस्या को उजागर कर दिया है। आईपीएल  का यह सीजन मैदान पर खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन के लिए कम और बाहरी लोगों की लगातार मौजूदगी के लिए ज्यादा जाना जा रहा है। खिलाड़ियों के माता-पिता, रिश्तेदारों, दोस्तों और फ्रेंचाइजी मालिकों को मैदान पर और टीम के होटलों में बेरोकटोक जाने की खुली छूट मिल गई है। इस लापरवाही ने एक बेहद पेशेवर क्रिकेट टूर्नामेंट को किसी ऑफ-सीजन सोशल कैंप या पारिवारिक पिकनिक में बदल कर रख दिया है।

टूर्नामेंट के बीच में ही हालात इस कदर बिगड़ गए कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई को मजबूरन दखल देना पड़ा। राष्ट्रीय टेलीविजन और सोशल मीडिया पर अनुशासनहीनता के दृश्य देखकर परेशान बीसीसीआई ने सभी फ्रेंचाइजी टीमों को सात पेज की एक बेहद सख्त एडवाइजरी जारी की। क्रिकेट की इस सर्वोच्च संस्था ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी कि इस तरह के लगातार नियम उल्लंघन लीग के वैश्विक ब्रांड की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।

यह एडवाइजरी महज एक पत्र नहीं था। इसे आईपीएल चेयरमैन अरुण धूमल और बोर्ड की भ्रष्टाचार निरोधक एवं सुरक्षा इकाई की गंभीर चिंताओं के आधार पर तैयार किया गया था। इस रिपोर्ट में कई ऐसी चौंकाने वाली विसंगतियों को उजागर किया गया जो खेल की पवित्रता के लिए सीधा खतरा हैं। इनमें सबसे प्रमुख है अनधिकृत प्रवेश। कई खिलाड़ी और सपोर्ट स्टाफ टीम मैनेजर की पूर्व मंजूरी के बिना अपने मेहमानों को सीधे होटल के कमरों में बुला रहे हैं।

दूसरा बड़ा मुद्दा फ्रेंचाइजी मालिकों का सीधा दखल है। लाइव मैच के दौरान मालिकों द्वारा डगआउट के पास आना और खिलाड़ियों को गले लगाना नियमों का खुला उल्लंघन है। इसके अलावा सबसे हैरान करने वाली बात ड्रेसिंग रूम, डगआउट और ट्रेनिंग एरिया में ई-सिगरेट और वेप का धड़ल्ले से इस्तेमाल होना है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के नियमों के अनुसार ड्रेसिंग रूम एक बेहद सुरक्षित जगह होती है, लेकिन यहां सारे नियम टूटते नजर आ रहे हैं।

वीआईपी कल्चर और खिलाड़ियों को मिल रही अनुचित छूट

हालांकि, बीसीसीआई की एडवाइजरी और उसकी वास्तविक कार्रवाई में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिला है। बोर्ड के इरादे कागजों पर तो बहुत सख्त लग रहे थे, लेकिन जब सजा देने की बारी आई तो कहानी बिल्कुल अलग थी। उदाहरण के लिए, एक स्टार खिलाड़ी को ड्रेसिंग रूम के अंदर वेप पीते हुए पकड़ा गया, लेकिन उस पर केवल मैच फीस का 25 फीसदी जुर्माना लगाया गया। कई पूर्व क्रिकेटरों और खेल पंडितों का मानना है कि इतनी मामूली सजा खेल की भावना को बनाए रखने में पूरी तरह विफल है और यह खिलाड़ियों को बड़ी गलती करने से नहीं रोक सकती।

इससे भी ज्यादा चिंताजनक घटना तब घटी जब एक खिलाड़ी को विमान में यात्रा करते समय वेप पीने की कोशिश करते हुए पाया गया। अगर देश का कोई आम नागरिक ऐसा करता है, तो उसे इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट निषेध अधिनियम के तहत गंभीर कानूनी कार्रवाई और भारी जुर्माने का सामना करना पड़ता है। लेकिन ऐसा लगता है कि क्रिकेट के एलीट वर्ग के लिए अलग नियम बनाए गए हैं। खेल विशेषज्ञों का साफ कहना है कि यदि बीसीसीआई यह स्वीकार करता है कि किसी खिलाड़ी ने जानबूझकर अनुशासनहीनता की है, तो सजा ऐसी होनी चाहिए जो भविष्य के लिए एक नजीर बने। किसी भी खिलाड़ी को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि वह कानून से ऊपर है।

बल्लेबाजों का एकतरफा दबदबा और खत्म होता खेल का संतुलन

मैदान के बाहर के विवाद जहां अतीत की फिक्सिंग और देर रात की पार्टियों की याद दिला रहे हैं, वहीं मैदान के अंदर का खेल अपने ही अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। मौजूदा आईपीएल लगातार आसमान छूते छक्कों का एक नीरस टूर्नामेंट बनता जा रहा है, जिसने बल्ले और गेंद के बीच के प्रतिस्पर्धात्मक संतुलन को पूरी तरह खत्म कर दिया है। एक समय था जब छोटे प्रारूप में 160 रन का लक्ष्य भी चुनौतीपूर्ण माना जाता था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी साफ हो जाती है। लीग के केवल 58 मैचों में 50 बार 200 रनों का आंकड़ा पार किया जा चुका है, जबकि लीग चरण के कई मैच, क्वालीफायर, एलिमिनेटर और फाइनल मुकाबला अभी बाकी है। ज्यादातर मैचों का परिणाम पावरप्ले के शुरुआती छह ओवरों में ही तय हो जाता है, जिससे बाकी का खेल पूरी तरह से अनुमानित लगने लगता है।

बल्लेबाजों के इस कदर हावी होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस सीजन में अब तक 11 शतक लग चुके हैं, जिनमें से नौ नाबाद पारियां रही हैं। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि शतक पूरा करने का औसत 50 गेंदों से भी कम का रहा है। छोटी बाउंड्री और केवल घरेलू टीमों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई पाटा पिचों को लेकर फैंस खासे नाराज हैं। अब प्रशंसक आईपीएल को एक गंभीर खेल प्रतियोगिता के बजाय सिर्फ एक ग्लैमरस इवेंट के रूप में देखने लगे हैं। दर्शकों की यह निराशा आंकड़ों में भी साफ झलक रही है। टीवी दर्शकों की संख्या घट रही है और लोग या तो डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर जा रहे हैं या फिर मैचों से दूरी बना रहे हैं।

इम्पैक्ट प्लेयर नियम का विवाद और बढ़ता चोट का ग्राफ

हाल ही में लागू किए गए विवादास्पद 'इम्पैक्ट प्लेयर' नियम को लेकर भी लगातार आलोचना हो रही है। वर्तमान और पूर्व क्रिकेटरों का कहना है कि यह नियम खेल में एक कृत्रिम असंतुलन पैदा करता है। इस नियम की वजह से टीमें एक अतिरिक्त बल्लेबाज के साथ खेलती हैं, जिससे असली ऑलराउंडर खिलाड़ियों की भूमिका लगभग खत्म हो गई है। बल्लेबाज बिना किसी डर के शुरू से ही बड़े शॉट खेलने लगते हैं, जो गेंदबाजों के लिए किसी सजा से कम नहीं है।

इसके अलावा, इतनी लंबी और थकान भरी लीग का शारीरिक असर भी खिलाड़ियों पर भारी पड़ रहा है। लगातार यात्रा और कड़े मैचों के कारण खिलाड़ियों का शरीर जवाब दे रहा है। अकेले इस साल खिलाड़ियों की चोटों और टूर्नामेंट से नाम वापस लेने के कारण फ्रेंचाइजी टीमों को लगभग 57.6 करोड़ रुपये की नीलामी कीमत का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। जब कोई महंगा खिलाड़ी चोटिल होकर बाहर होता है, तो टीम की पूरी रणनीतिक और आर्थिक योजना धरी की धरी रह जाती है।

श्रीलंका के तेज गेंदबाज मथीशा पथिराना की अनुपस्थिति से लेकर बांग्लादेश के मुस्तफिजुर रहमान की उनके देश वापसी को लेकर हुए विवाद तक, आईपीएल वर्तमान में एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां उसे कड़े फैसले लेने होंगे। जैसे-जैसे 2026 का सीजन आगे बढ़ रहा है, बीसीसीआई के सामने एक बहुत स्पष्ट विकल्प है। या तो वे तुरंत कड़े कदम उठाकर अनुशासन बहाल करें और खेल के बिगड़ते संतुलन की चिंताओं को दूर करें, या फिर दुनिया की सबसे अमीर क्रिकेट लीग को अपनी ही ज्यादतियों के कारण अपनी आत्मा खोते हुए देखने के लिए तैयार रहें।

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