तीरंदाज शीतल देवी हाथ से नहीं पैर से करती हैं कमाल

सीमाओं से परे है अर्जुन अवॉर्डी इस बेटी का हौसला

खेलपथ संवाद

जम्मू-कश्मीर। जम्मू के खूबसूरत किश्तवार जिले में शीतल देवी नाम की एक विलक्षण लड़की रहती है। जन्म से ही बाँहें न होने के बावजूद, उसका हौसला सीमाओं से परे है। उसकी असाधारण यात्रा की शुरुआत तब हुई जब उसने तीरंदाजी के प्रति अपना जुनून खोजा। अर्जुन अवॉर्डी यह बेटी अब तक दर्जनों पदक जीत चुकी है।

शारीरिक चुनौतियों से विचलित हुए बिना, शीतल ने निडर होकर इस खेल को अपनाया। अपने पैरों से धनुष को पकड़ती, दाँतों से डोरी बाँधती और कंधे से डोरी खींचती। उनके दृढ़ संकल्प और सहनशीलता ने ओजीक्यू अनुसंधान टीम का ध्यान आकर्षित किया, जिन्होंने उनकी क्षमता को पहचाना और जब वह महज 15 वर्ष की थीं, तब उन्हें सहयोग देने का निर्णय लिया।

शीतल ने चेक गणराज्य में आयोजित पैरा तीरंदाजी यूरोपीय कप में अपना अंतरराष्ट्रीय पदार्पण किया। मजबूत प्रतिद्वंद्वियों के बीच उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए जीत हासिल की। ​​शीतल ने कंपाउंड ओपन व्यक्तिगत स्पर्धा में रजत पदक जीता, जो उनका पहला अंतरराष्ट्रीय पदक था। उनके असाधारण कौशल ने उन्हें मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक और महिला युगल में कांस्य पदक भी दिलाया।

फाइनल में शीतल का मुकाबला ब्राजील की जेन कार्ला से हुआ, जो वर्तमान में विश्व रैंकिंग में तीसरे स्थान पर हैं। हालांकि शीतल 144-142 के मामूली अंतर से हार गईं, लेकिन उनके शानदार प्रदर्शन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। गौरतलब है कि उन्होंने क्वार्टर फाइनल में टोक्यो 2020 पैरालम्पिक स्वर्ण पदक विजेता को हराया था। 720 में से 682 का उनका क्वालीफाइंग स्कोर उनकी विश्व स्तरीय प्रतिभा को दर्शाता है।

शीतल की इस यात्रा के पीछे ओलम्पिक गोल्ड क्वेस्ट का अटूट समर्थन था। उन्होंने शीतल को पोषण, व्यक्तिगत कोचिंग, फिजियोथेरेपी, तीरंदाजी उपकरण और सहायक सामग्री उपलब्ध कराई, जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि उन्हें उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए आवश्यक सब कुछ मिले। शुरुआत में, उच्च गुणवत्ता वाले उपकरण प्राप्त करना शीतल के लिए एक चुनौती थी, लेकिन ओलम्पिक गोल्ड क्वेस्ट की सहायता से उनके सपने साकार हो गए। उनके निजी कोच, कुलदीप वैद्यन ने उनके कौशल को निखारने और सफलता की ओर मार्गदर्शन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

शीतल देवी, एक युवा तीरंदाज जो तमाम बाधाओं को पार करती है, "कभी हार न मानने" की सच्ची भावना का प्रतीक है। उनकी कहानी सभी को प्रेरित करती है, और हमें याद दिलाती है कि जुनून और दृढ़ता के साथ, हम जीवन की किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं।

रिलेटेड पोस्ट्स