दुनिया ने माना टीम इंडिया सफेद गेंद की असली सरताज
टेस्ट क्रिकेट की फिसलन हमारी चिंता का विषय होना चाहिए
श्रीप्रकाश शुक्ला
ग्वालियर। एक बार फिर भारत ने क्रिकेट के सबसे छोटे स्वरूप टी-20 में अपनी सर्वोच्चता साबित की है। हालांकि, भारत के हर क्षेत्र में शानदार खेल ने दर्शकों को फाइनल मुकाबले के रोमांच से वंचित किया, लेकिन भारतीय टीम ने हर क्षेत्र में बेजोड़ श्रेष्ठता प्रदर्शित की। भारतीय टीम निर्भीकता से खेली और समूची दुनिया को बता दिया कि सफेद गेंद की वही सरताज है।
खिताबी मुकाबले को लेकर हर भारतीय मन में संदेह था कि हमारा नम्बर एक बल्लेबाज और गेंदबाज कैसे खेलेगा। चिन्ता जायज थी लेकिन मुख्य कोच गौतम गंभीर का अभिषेक शर्मा और वरुण चक्रवर्ती को अनियमित फॉर्म के बावजूद महत्वपूर्ण फाइनल के लिये टीम में बरकरार रखना सही साबित हुआ। संजू सैमसन ने तीन सबसे महत्वपूर्ण मैचों में निर्णायक पारियां खेलीं। वहीं चतुर तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह ने अपनी गेंदबाजी का जादू बिखेरा।
हार्दिक पांड्या, अक्षर पटेल, ईशान किशन, शिवम दुबे ने महत्वपूर्ण अवसरों पर योगदान दिया। यह अच्छी बात है कि सुपर आठ के एक मैच में दक्षिण अफ्रीका से मिली करारी हार को भारतीय टीम ने एक सबक के तौर पर लिया। जिससे टीम को जीत की लय में वापस आने में सहायता मिली। यह सुखद ही है कि दो साल से भी कम समय में भारतीय टीम ने टी-20 विश्व कप के दो खिताब हासिल किए।
निस्संदेह, इस उल्लेखनीय उपलब्धि में इंडियन प्रीमियर लीग में टी-20 मैचों का लगातार अभ्यास जीत की लय बनाये रखने में मददगार साबित हुआ। क्रिकेट के दीवाने इस देश में प्रीमियर लीग ने क्रिकेट प्रतिभाओं को अपने खेल में निखार लाने का एक बेहतर अवसर उपलब्ध कराया। यह शानदार जीत, भारत द्वारा वनडे चैम्पियंस ट्रॉफी जीतने के ठीक एक साल बाद मिली है। लेकिन एक अंतर्विरोध यह भी है कि सफेद गेंद के क्रिकेट और व्यावसायिक खेल के इस मिश्रण ने टेस्ट क्रिकेट में भारतीय टीम की कमजोरी को उजागर किया है। जिसका उदाहरण घरेलू सीरीज में न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका से मिली करारी हार है, जो हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। यह एक हकीकत है कि जब तक भारत टेस्ट मैचों में अपनी स्थिति मजबूत नहीं करता, तब तक भारत का वैश्विक क्रिकेट में पूरी तरह वर्चस्व हासिल करना सम्भव न होगा।
कमोबेश, महिला टीम के मामले में भी यही बात लागू होती है, जिसने पिछले साल नवम्बर में वनडे विश्व कप जीता। लेकिन टेस्ट क्रिकेट में इस टीम की पकड़ भी ढीली हुई है। वास्तव में दोनों टीमों को क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में संतुलित कामयाबी के साथ ही आगे बढ़ना होगा। इस हकीकत को जानते हुए कि खेल जगत के परिप्रेक्ष्य में क्रिकेट का दबदबा हमेशा बना रहना है, अब चाहे टीमें अच्छा खेलें या कमजोर।
भारत में उपलब्ध क्रिकेट के समृद्ध संसाधनों और लगातार सामने आती नई प्रतिभाओं के चलते आईसीसी की तमाम प्रतियोगिताओं में भारतीय दबदबा आने वाले वर्षों में भी बना रह सकता है। इस टी-20 विश्व कप में भारतीय जीत को इसी नजरिये से देखने की जरूरत है। लेकिन जरूरत इस बात की होगी कि व्हाइट बॉल के साथ भारतीय टीम रेड बॉल क्रिकेट में अपना वर्चस्व बनाये रखे। टीम वनडे और टी-20 के साथ टेस्ट क्रिकेट में भी तमाम परिस्थितियों के बावजूद जीत का जज्बा बनाये रखे। इस टूर्नामेंट में संजू सैमसन द्वारा दिखाया गया खेल भारतीय टीम के लिये निर्णायक साबित हो सकता है। जिन्होंने तीन महत्वपूर्ण मैचों में अस्सी से अधिक रन बनाकर जीत में अहम भूमिका निभायी है।
लम्बे समय तक उपेक्षित रहने के बावजूद जब उन्हें परिस्थितिवश खेलने का मौका मिला तो उन्होंने अवसर का भरपूर लाभ उठाकर खुद को साबित किया। वे सिर्फ पांच मैच खेलने के बावजूद टूर्नामेंट के सबसे शानदार खिलाड़ी का खिताब हासिल करने में कामयाब हुए। इसी तरह टूर्नामेंट में किफायती रन रेट के साथ निर्णायक विकेट लेने वाले जसप्रीत बुमराह की उपलब्धियां भी कम नहीं रहीं। विपक्षी टीम के खिलाड़ियों पर वे मनौवैज्ञानिक दबाव बनाने में भी कामयाब रहे। वे मैच की दिशा बदलने वाले गेंदबाज भी साबित हुए।
निर्णायक फाइनल मैच में तीन विकेट लेने वाले अक्षर पटेल के योगदान को भी नहीं भुलाया जा सकता। लेकिन अभी भी टीम को अपनी फील्डिंग में चुस्ती लाने की जरूरत है ताकि फिर किसी टूर्नामेंट में एक दर्जन से अधिक कैच छोड़ने की तोहमत न लगे। बहरहाल, नए क्रिकेटरों की ऊर्जा इस टूर्नामेंट में भारत का पलड़ा भारी करने में खासी मददगार साबित हुई।
