मध्य प्रदेश में 100 स्कूलों पर एक खेल शिक्षक
खेल शिक्षकों और छात्र-छात्राओं के खेल में हो रहा खेला
खेलपथ संवाद
भोपाल। खेलो मध्य प्रदेश यूथ का सरकारी प्रयास बेशक किसी तरह परवान चढ़ गया हो लेकिन सच्चाई यह है कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में छात्र-छात्राओं के खेल में खेला किया जा रहा है। प्रदेश में लगभग 92 हजार शासकीय स्कूलों में से अधिकांश स्कूलों में न तो खेल शिक्षक हैं और न ही खेल सिखाने की व्यवस्था। स्थिति इतनी गंभीर है कि औसतन एक खेल शिक्षक पर सौ से ज्यादा स्कूलों की जिम्मेदारी है।
मध्य प्रदेश में खेलों को बढ़ावा देने के सरकारी दावे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। सरकारी स्कूलों में खेल शिक्षा आज भी उपेक्षा का शिकार है। स्कूलों में न प्रशिक्षित खेल शिक्षक हैं, न ही खेल मैदान। उपकरण तो कागजों में ही खरीदकर पैसे की बंदरबांट हो जाती है। शिक्षा विभाग प्रतिवर्ष लाखों छात्र-छात्राओं से खेल शुल्क के नाम पर करोड़ों रुपये वसूलता है लेकिन उन्हें शारीरिक शिक्षा से दूर रखा जाता है।
दरअसल, सरकारी दस्तावेजों और आदेशों में खेल शिक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी योजनाएं दिखाई देती हैं, लेकिन हकीकत में स्कूली खेल मैदान वीरान पड़े हैं। प्रदेश में करीब 92 हजार शासकीय स्कूल हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश स्कूलों में न तो खेल शिक्षक पदस्थ हैं और न ही खेल सिखाने की कोई व्यवस्था है। स्थिति इतनी गंभीर है कि पूरे प्रदेश में 92 हजार स्कूलों में मात्र 700 नियमित खेल शिक्षक हैं, यानी औसतन एक खेल शिक्षक पर सौ से ज्यादा स्कूलों की जिम्मेदारी है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर छात्र-छात्राओं को खेल शिक्षण-प्रशिक्षण कैसे मिलता होगा।
मध्य प्रदेश के स्कूलों में शारीरिक शिक्षा की स्थिति बदतर होने के बावजूद छात्र-छात्राओं से क्रीड़ा शुल्क पूरा लिया जाता है। नियमों के मुताबिक कक्षा 9वीं और 10वीं के छात्र-छात्राओं से हर साल 120 रुपये, जबकि 11वीं और 12वीं के छात्र-छात्राओं से 200 रुपये खेल शुल्क वसूला जाता है। यह शुल्क हर साल नियमित रूप से लिया जाता है, लेकिन बदले में छात्र-छात्राओं को खेलों में कुछ भी नहीं मिलता। सवाल उठता है कि जब स्कूलों में खेल ही नहीं कराए जा रहे, तो यह शुल्क आखिर किस मद में वसूला जाता है?
मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में खेल शिक्षकों की 2006 के बाद से नियमित भर्ती न होने के कारण हजारों पद रिक्त हैं, जिससे छात्र-छात्राओं की शारीरिक शिक्षा प्रभावित हो रही है तथा नई शिक्षा नीति का चीरहरण हो रहा है। राज्य भर के सरकारी स्कूलों में 70 हजार से अधिक शारीरिक शिक्षकों के पद खाली बताए जा रहे हैं। प्रदेश में खेल शिक्षकों की आखिरी बड़ी नियमित भर्ती वर्ष 2006 में हुई थी। खेल शिक्षकों की भर्ती न होने से युवाओं में भारी आक्रोश है।
खेल शिक्षकों की कमी से खेल गतिविधियां नाममात्र की रह गई हैं तो खेल पीरियड भी नहीं लगते। मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शारीरिक शिक्षा के नाम पर तेली का काम तमोली से कराया जा रहा है। खेल प्रशिक्षकों के पद खाली होने के बावजूद, विभाग द्वारा उचित व्यवस्था नहीं की जा रही है। शिक्षित बेरोजगारों (बीपीएड-एमपीएड डिग्रीधारक) द्वारा लगातार भर्ती की मांग की जा रही है, लेकिन लम्बे समय से खेल शिक्षकों की नियुक्ति न होने से वे बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं।
