खेलों के खराब सिस्टम से हारीं खिलाड़ी बेटियां हमारी
प्रेमा विश्वास और दिव्यांशी चौधरी की पीड़ा खेलों का दुखद अध्याय
खेलपथ शब्द-सहयात्री
ग्वालियर। खेल के मैदान में हारना कोई बड़ी बात नहीं। खिलाड़ी हारता है, फिर उठता है, मेहनत करता है और अगली प्रतियोगिता में जीत की तलाश करता है। लेकिन जब कोई खिलाड़ी मैदान में नहीं बल्कि खेल व्यवस्था के खराब सिस्टम से हार जाए, तो उसका दर्द कहीं ज्यादा गहरा होता है। प्रेमा विश्वास और दिव्यांशी चौधरी की कहानी आज हमारे खेल तंत्र के सामने ऐसा ही सवाल खड़ा कर रही है।
उत्तराखंड की पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी प्रेमा विश्वास ने विपरीत परिस्थितियों के बीच संघर्ष करते हुए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीन स्वर्ण सहित 18 पदक जीते। उसके भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून था। सपना था कि जापान में होने वाले 20वें एशियाई खेलों में वह भारत का प्रतिनिधित्व करे और तिरंगा लहराए। लेकिन यह सपना पूरा नहीं हो सका।
सबसे बड़ा दर्द यह है कि अगला एशियाई खेल 2030 में होगा और तब प्रेमा 42 वर्ष की हो जाएगी। यानी एक ऐसी खिलाड़ी, जिसने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष खेल को दिए, उसके लिए एशियाई खेलों का यह अवसर शायद फिर कभी लौटकर न आए। यह केवल प्रेमा की हार नहीं है। यह उस सपने की हार है, जिसे एक बेटी ने वर्षों की मेहनत और संघर्ष से सींचा था।
राजस्थान की होनहार वुशू खिलाड़ी दिव्यांशी चौधरी का प्रसंग भी खेल व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करता है। परिस्थितियां चाहे जो रही हों, किसी खिलाड़ी की आवाज और उसके अनुभव को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। यदि खिलाड़ियों को अपनी बात कहने में संकोच या दबाव महसूस होने लगे तो यह स्वस्थ खेल वातावरण के लिए शुभ संकेत नहीं है।
खेलपथ किसी व्यक्ति या संस्था को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं है। खेलपथ तो खेल और खिलाड़ी के साथ खड़ा है। हमारा सवाल सिर्फ इतना है- क्या हमारे खेल-तंत्र में प्रतिभा के साथ पूरा न्याय हो रहा है? क्या चयन प्रक्रिया इतनी पारदर्शी है कि खिलाड़ी को यह भरोसा हो कि मैदान पर उसकी मेहनत, प्रदर्शन और योग्यता ही उसके चयन का आधार बनेगी? खिलाड़ी बेटियां किसी की कृपा नहीं चाहतीं। वे सिर्फ अपना हक और अवसर चाहती हैं।
एक खिलाड़ी को तैयार करने में वर्षों लगते हैं। परिवार का त्याग, प्रशिक्षक की मेहनत और खिलाड़ी का संघर्ष उसमें शामिल होता है। इसलिए किसी प्रतिभा का उचित अवसर से वंचित होना केवल उस खिलाड़ी का नुकसान नहीं, देश की सम्भावित उपलब्धि का नुकसान भी है। प्रेमा और दिव्यांशी की कहानियां हमें किसी से लड़ने के लिए नहीं, बल्कि खेल व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करें। खेलपथ का सवाल हमेशा यही रहेगा- खेलों में खामी तलाशने से पहले हम राष्ट्र को क्या दे सकते हैं? और खिलाड़ी बेटियों के मामले में हमारा उत्तर साफ है- उन्हें न्यायपूर्ण अवसर दीजिए, वे देश को गौरव देने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी।
